श्रमिक दिवस विशेष 

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लेखिका/कवयित्री

सुश्री सरोज कंसारी

नवापारा राजिम

रायपुर(छ. ग.)

 

                (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

श्रमिक दिवस विशेष 

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आलेख

   ————–

मेहनतकश मैं एक मजदूर हूँ, कौन कहता मैं आज मजबूर हूँ?

 

श्रम से ही रचते हैं इतिहास श्रमिक।

 

  सर्दी- गर्मी व बारिश भी सहता हूं 

    शिकायत किसी से नहीं करता हूं, 

    अपनी राह ही अनवरत चलता हूं 

    पूंजीपति के शोषण का शिकार हूं, 

    नही मानता फिर भी कभी हार हूं।।

 

बहुत ही आसान होता हैं -महान धार्मिक ग्रंथ वेद -पुराण, रामायण- महाभारत, गीता और महापुरुषों की जीवनी पढ़कर ज्ञान बांटना व नसीहत देना ।दिखावे के लिए बड़ी-बड़ी बातें करना औऱ झूठी सांत्वना देना। लेकिन दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता हैं- किसी के मन को पढ़ पाना, उनके दर्द को महसूस करना, तकलीफ को समझना, परेशानियों को सुनना और उस वेदना को स्वयं सहन कर पाना।

इस संसार में हर तरह के मनुष्य हैं सबके जीने के अपने ढंग हैं, सलीका हैं, उनके आत्मसम्मान हैं। किसी को बिना जाने हम अंदाजा नहीं लगा सकते, कौन किस परिस्थिति में जी रहा हैं? और सबको लगता हैं कि -खुद से बढ़कर कोई और परेशान नही एक वही हैं जो दुखी है, बाकी सब सुखी। दोस्तों ! हमारी सोच जहाँ तक जा पाती हैं हम वहीं तक सोचतें हैं।लेकिन किसी की अंतरात्मा की गहराई में झांककर देखें तो दिखाई देगा, जान पायेंगे कि किसे कहते हैं बेबसी और लाचारी, कैसे बिलखते हैं वे लोग, न जानें कितनी होती हैं पीड़ा ,क्यूँ होते हैं खामोश? शायद इसका आपके पास जवाब न हो।

मौत के आगोश में पलते हैं कुछ इंसान। हर पल रोते हैं, तड़पते हैं पर कभी व्यक्त नहीं करते।

क्या आपकी बड़ी-बड़ी डिग्री इनके जख्मों पर मरहम लगा सकती हैं। कभी सोचें हैं किस हद तक समर्पित होकर दर्द की अंतिम सीमा में डूबकर कार्य में लीन रहते हैं।

 

हमारे इस समाज में हर वर्ग के लोग हैं जिनकी सबसे प्रथम आवश्यकता होती हैं रोटी- कपड़ा और मकान। जिसके लिए हम सभी ही दिन-रात लगे रहते हैं। येन- केन- प्रकारेण इनकी पूर्ति करना पहला कर्तव्य हैं। इसके अभाव में किसी भी सुख की कल्पना नहीं की जा सकती। सुबह से शाम तक रोजी-रोटी की तलाश में लगे रहते हैं। कुछ बेईमानी से कम समय में धनवान बन जाते हैं, तो कोई ईमानदारी से भी कुछ नहीं कमा पाते हैं। कोई शारीरिक रूप से अक्षम होने से दीन-दुखी बन औरो की दया पर जीते हैं। यही से शुरू होता हैं अमीर- गरीब के बीच की सीमा शोषक- शोषित, धनवान, तो गरीब- पूंजीपति व मजदूर।

 

मेहनत तो सभी करते हैं, पर सभी को समान सुविधा- साधन और संपन्नता नहीं मिल पाता, आखिर क्यूँ ? अमीर जिनके पास बड़े-बड़े महल अटारी, हर सुख-सुविधा, बैंक-बैलेंस मोटर-  गाड़ी, नौकर- चाकर हैं वे ऐशो-आराम से ही जीवन गुजारते हैं।दूसरी तरफ मजदूर वर्ग हैं- जिसे श्रमिक कहा जाता हैं। जो हर तरह के छोटे-बड़े निर्माण कार्य करते हैं। अपनी मेहनत खून-पसीने को सींचकर भी दो वक्त की रोटी नहीं जुगाड़ कर पाते। उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिल पाती, दिन-रात एक करने के बाद भी कर्ज में लदे ही रहते हैं।

एक अनकही लाचारी होती हैं। अनंत मानसिक तनाव जिसे व्यक्त करना संभव नही शब्दों में ।ठीक से भोजन भी नसीब नही होता मजदूरी से शुरू होती हैं जिंदगी और अंत भी वहीं हो जाता है। क्यूँ आखिर कब तक चलेगा ये भेदभाव ? हैं किसी के पास हैं इस समस्या का हल। कड़ी धूप में मजदूर ठेले में भारी बोझ लिए हुए लड़खड़ाते कदमो से खिंचता हैं ठेला, मिलता क्या हैं उसे? पचास से अधिकतम सौ रुपये। पर किसी अमीर की आत्मा भी नही कचोटती ,यह दृश्य देखकर भी ।रिक्शा चालक, लोहार,  कारीगर, मिस्त्री और किसान ये सब बहुत मेहनत करके भी अपने परिवार का भरण-पोषण करने में असमर्थ होते हैं।

 

एक अमीर व्यक्ति जिनके यहाँ कोई मजदूरी करके अपनी आजीविका चलाते हैं, वह मालिक उनको अपना गुलाम समझता हैं। मेहनत की राशि देने में भी कंजूसी करते हैं। धिक्कार ! हैं ऐसे लोगो को सुबह से रात तक काम लेने के बाद भी उनसे बुरा बर्ताव करना, ये मानवता की निशानी नहीं। किसी की मजबूरी का फायदा उठाना कहाँ की इंसानियत हैं ? आखिर एक ही मिट्टी के हम सब पुतले हैं एक दिन सब कुछ छोड़ मिट्टी में मिल जाना हैं। लेकर क्या जायेंगे? मेहमान तो हैं सभी इस धरती पर। फिर क्यों इतनी बात समझ नहीं आती किसी को ? एक मजदूर युवा अवस्था से न जाने कितने आलीशान बंगले बनाता हैं। जब वो बुजुर्ग हो जाता हैं तब भी अपने लिए एक छोटा सा मकान भी नहीं बना पाता। कारखानों में कपड़े बनाने वाला अपने तन ढकने के लिए ढंग से कपड़े नहीं खरीद पाता। कैसी विडंबना हैं इस देश की ? जो श्रमिक लीन हैं अपने ही कामो में, सृजन करते हैं संसार की, मेहनत करना जिनकी पूजा हैं, छल-प्रपंच से दूर हैं, वो रचते हैं इतिहास अपने लगन से। उम्मीद की एक किरण लेकर वे चलते हैं हिम्मत से।

मौसम बदलते रहते हैं वे अडिग रहते हैं अपनी जगह। कड़कड़ाती धूप में बहता हैं पसीना, पड़ जाते हैं पैरों में छाले, जलता हैं बदन, भीगता हैं तन, ठिठुरता हैं, कंपकपाते हैं हाथ ।फिर भी नहीं शिकायत करते किसी से। तप करते हैं हर वक्त।

 

उनके जेहन में एक ही बात होती हैं जिम्मेदारी का निर्वहन करना। कभी थकते नहीं, कही ठहरते नहीं अनवरत चलते हैं। दफ़न हो जाता हैं हृदय में उनके हर अरमान, कभी कह नहीं कर पाता वह अपनी अथाह पीड़ा।

 

समय परिस्थिति और सोंच बदल गई हम आज तकनीकी युग मे जी रहें हैं। जहाँ सब कुछ संभव हैं कठिन से कठिन कार्य सहजता से हो जाते हैं।

 

फिर आज तक मजदूर की ही स्थिति क्यूँ नहीं बदली, मजबूरी की जिंदगी से वे क्यूँ नहीं निकल पा रहे ? आज भी बेहाल हैं जीवन उनका। बद से बदत्तर स्थिति में हैं वे।

 

अभी हाल में हम सभी ही भयंकर महामारी के गिरफ्त में रहे, उसके दंश को झेले, मौत के मुँह से निकले हैं। आज भी उसकी कसक हैं इस परिस्थिति से गुजरने के बाद शारीरिक- मानसिक औऱ आर्थिक रूप से हम सभी को बहुत ही हानि हुई हैं, पूरा विश्व हिल गया। ऐसे लगा की इस महामारी से जो बच जायेंगे वे मानवता को समझेंगे, उनमें इंसानियत होगी। दया- सहानुभूति, अपनापन और प्रेम होगा, सहयोग करेंगे एक दूजे की, भेदभाव की हर लकीर मिट जाएंगी। लेकिन यहाँ तो नजारा ही कुछ और हैं कितनी आसानी से भूल गये मौत के उस मंजर को। ईश्वर के उपकार को, जिसने हमें अवसर दिया जीने का, परोपकार करने का, फर्ज निभाने का। यहाँ तो एक दूसरे को पीछे करने और आगे बढ़ने की होड़ लगी हैं। भूलिए मत ! किसी को इतना मत सताना की भगवान आपको माफ न कर सकें। वो देखता सब कुछ हैं, वक्त हैं बदलता जरूर हैं। मजदूर को भी अधिकार हैं शान से जीने का, सभी की सुख-सुविधाओं से पूर्ण होने का। अब समय हैं सबके हित में कार्य करने का। कोई भी किसी के क्रूर व्यवहार का शिकार न हो, किसी के गुलाम न हो। श्रम का इतना दुरुपयोग मत करिए की उसकी जुबां से आह! निकल जाएं।

 

हम सभी आज महंगाई की समस्या से गुजर रहें हैं। कम आमदनी हैं और खर्च अधिक। आप जरा सोचिए! कितनी मानसिक पीड़ा होती होगी जब कठिन मेहनत करके भी अपनी आवश्यकताओं को पूरा न कर पाएं कोई। कम से कम मेहनत का बराबर वेतन दें। इतना मजदूरी अवश्य दें की उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकें। मजदूर हैं उसे मजबूर मत बनाइए। आपस में भाईचारे का भाव रखें, विश्व बंधुत्व के भाव को प्रचारित करें।

 

झुग्गी-झोपड़ी में, सड़कों पर, स्टेशन में रहने वाले मजदूर के परिवार से मिलकर देखें। कभी उनकी दैनिक दिनचर्या को जाने समझे। अपने आप को उस जगह रखकर देखिए, तब आप ही समझ पायेंगे कैसे मुश्किल होता हैं खर्च वहन करना ?अपने विशाल मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखें। किसी भी मजदूर को मानसिक यातना न दें, उनकी ख्वाहिशों को भी इक उड़ान दें। कैद न करें अपनी कुंठित सोच से। एहसास हैं उनमें भी, खुले आसमान में चैन की सांस लेने की चाह उन्हें भी हैं।

 

आइए! मिलकर हम सभी पहल करें। कोई किसी पर अत्याचार न करें। पूंजीपति वर्ग को खबरदार करें। बंद करो अब अत्याचार ! मिलें सबको उनका अधिकार। अमीर- गरीब के बीच मिटाएं भेदभाव। अधिकार के लिए लड़े सभी, आवाज बुलंद करें।सहयोग के लिए कदम बढ़ाएं सपनो से सुंदर ये जहान बनाएं।

मेहनतकश मैं एक मजदूर हूँ,

      कौन कहता मैं आज मजबूर हूँ?

      खून-पसीना दिन भर बहाता हूँ,

      परिवार का तब पेट भर पाता हूँ

      नहीं किसी पर मैं बनता बोझ हूँ।।

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