भागते-भागते हम दुनिया को तो जान लेते हैं, पर खुद को भूल जाते हैं। सूनापन वो ब्रेक है जो हमें याद दिलाता है कि हम भी हैं

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सुश्री सरोज कंसारी

  कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका

  अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति

  गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, (छ.ग.)

 

                    (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

आलेख –

भागते-भागते हम दुनिया को तो जान लेते हैं, पर खुद को भूल जाते हैं। सूनापन वो ब्रेक है जो हमें याद दिलाता है कि हम भी हैं

 -सुश्री सरोज कंसारी 

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जीवन एक सतत बहती नदी की तरह है। कभी यह कल-कल करती है, तो कभी शांत और गंभीर हो जाती है।…इस यात्रा में हर इंसान के सामने ऐसा पड़ाव आता है जहाँ बाहर सब कुछ सामान्य दिखते हुए भी भीतर एक अजीब-सा खालीपन घर कर जाता है। यह खालीपन डराने वाला नहीं, बल्कि आत्म-मंथन का एक सुनहरा अवसर है। यह हमें रोककर सोचने को मजबूर करता है कि हम कौन हैं और वास्तव में क्या चाहते हैं।…जीवन के किसी मोड़ पर इंसान के मन में एक सूनापन आ जाता है। कई तरह के विचारों के उमड़ने के बाद भी जब हम किसी निर्णय पर न पहुंच पाएं और लगातार नकारात्मक भाव आएं, अंतर्युद्ध से घिरे रहें तो मन एकदम उदासीन हो जाता है। सूनापन एक ऐसी अवस्था है जब हम अंतर्मन की गहराई में डूब जाते हैं। लगता है अब करने को कुछ नहीं। न कोई इंतजार, न लक्ष्य, न उत्साह। ऐसा लगता है जैसे सब थम-सा गया हो। बहुत समय से शारीरिक-मानसिक कष्ट, ताने, असफलता, कलह-विवाद, कानूनी समस्या, अपनों का गलत बर्ताव, प्रिय जनों के खो जाने से भी मन दुखी हो जाता है। कभी-कभी कुछ न होने से ही नहीं, सब कुछ धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा, बंगले-गाड़ी और अपनों की भीड़, रिश्ते-नाते, सगे-संबंधी के होने पर भी व्यक्ति खालीपन महसूस करता है। क्योंकि भीतर से वे अपनों का प्यार, साथ-लगाव, सुरक्षा, परवाह और अपनेपन की कमी कहीं न कहीं महसूस करते हैं। नौकरी, पारिवारिक जिम्मेदारी से मुक्त होने पर भी कई बार जीवन में खालीपन आ जाता है। कई बार अपनी नकारात्मक सोच, क्रोधी-लोभी स्वभाव के कारण हम अपनों से दूर हो जाते हैं और एक समय के बाद अफसोस होता है। स्वार्थी होने के कारण भी मानसिकता विकृत हो जाती है। खालीपन वह अवस्था है जब हम भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं। कुछ तो कमी होती है जिसकी पूर्ति संभव नहीं होती, और मानसिकता भीतर ही भीतर बोझिल हो जाती है। जहां जीवन उद्देश्य-विहीन हो जाता है तब लगता है, अब जीवन में कुछ बाकी नहीं रहा। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि यह खालीपन एक रिक्त कैनवास भी हो सकता है?

 

प्रकृति खाली जगह को कभी खाली नहीं रहने देती। जिस तरह बारिश के बाद धुला हुआ आकाश सबसे साफ होता है, उसी तरह मन का यह सूनापन भी पुरानी धूल झाड़कर नई संभावनाओं को जन्म देने का संकेत देता है। यह वह ठहराव है जो हमें तेज दौड़ती जिंदगी में खुद से मिलवाता है। इस मौन में छिपे संदेश को सुनना ही असली समझदारी है।

 

मन को जिसने जान लिया,

उसने जग को पहचान लिया,

भटकन सारी थम गई,

जब खुद को ही मान लिया।

इच्छाओं के पार जहाँ,

मौन की भाषा बोलती है,

आत्मबोध की ज्योति में,

मन की खुशी डोलती है।

 

जीवन जंग जीतना आसान नहीं, मुश्किल होता है, लेकिन हमारी सोच ही ताकत बन जाती है जब हम सब कुछ हार कर भी हौसला नहीं खोते। उस समय अपने जीवन के खालीपन को सही दिशा दीजिए, बोझिल, थकान भरी जिंदगी से निकलिए, नया माहौल निर्मित कीजिए। अपने दिल की सुनिए और अपने दिमाग को अच्छे कार्यों में लगाइए।…आपकी सोच और ख्वाहिश को पूर्ण करने और खुद के साथ समय व्यतीत करने का यह अमूल्य पल होता है। अतीत और भविष्य की चिंता में इच्छाओं के गुलाम होकर हम आज तक भटकते रहे, पर कभी आत्म-तृप्ति नहीं हुई। इच्छाओं का अब तक अंत नहीं हुआ। यह खालीपन एक अद्भुत क्षण है खुद से मुलाक़ात और सुकून प्राप्ति का। खालीपन आध्यात्म में डूबने और अलौकिक आनंद पाने का, जीवन के सर्वोच्च सुख की अनुभूति का यह समय है। खालीपन के बाद ही हम जीवन को अपने मूल स्वरूप में देख पाते हैं, आत्मा पवित्र हो जाती है। इस सांसारिक जीवन की यात्रा के बाद ही हम आत्म-शांति की तलाश करते हैं। जीवन निर्वहन करते हुए हमें लोगों की असलियत समझ आती है। झूठ-छल, धोखा-दिखावा से जब मन व्याकुल होता है, तब हम उससे निकलकर जीवन के सौंदर्य को देख पाते हैं। किसके मन की गहराई में क्या है, हम जान लेते हैं। ठोकर, संघर्ष, परेशानी और जिम्मेदारी के बाद जो समय होता है वह हमें इस क्षणिक जीवन के महत्व को बताकर हर पल को परोपकार, सत्य, करुणा, दया और प्रेम से भर देता है।

 

खालीपन से हम जीवन के अनछुए पहलुओं को जान पाते हैं। खालीपन से जीवन की नई कहानी प्रारंभ होती है, जहां हम अपनी शिकवे-शिकायतें, दर्द भूलकर, कुंठित मानसिकता, नादानी, झूठे लोगों को पीछे छोड़ आगे बढ़ते हैं। और पहले से अधिक जागरूक, निर्भीक, साहसी और आत्मविश्वासी बन जाते हैं। भ्रम से निकलकर हम वास्तविक जीवन जीने लगते हैं। याद रखिए, खालीपन अंत नहीं है, यह एक नए अध्याय की शुरुआत है। यह वह खामोशी है जिसमें आपकी आत्मा की आवाज सबसे साफ सुनाई देती है। इसे कोसिए मत, इसे अपनाइए। क्योंकि जिसने अपने खालीपन को सृजन में बदल दिया, उसने सचमुच जीवन को जीना सीख लिया। इस रिक्तता को प्रेम, ज्ञान और सेवा के रंगों से भर दीजिए, फिर देखिए यह जीवन कितना संपूर्ण लगने लगेगा। वैसे तो जिंदगी खालीपन को भरने का दूसरा नाम है। लेकिन जिंदगी कुछ भी पूरा नहीं देती। कुछ अधूरा-सा छूट ही जाता है। तभी तो कहा गया है कि – “किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीन तो कहीं आसमां नहीं मिलता।” चाहे जो भी हो, लेकिन अपने भीतर बैठे खालीपन को खूबसूरत रंगों से भरना बुद्धिमानी का परिचायक होता है। जीवन के खालीपन को प्रेम, सेवा, समर्पण, सहयोग, सत्संग और सद्विचार से भरें।

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