एग्जिट पोल्स, नतीजे आने से पहले जीत का ट्रायल वर्जन

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पवन वर्मा

 

                 (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

एग्जिट पोल्स, नतीजे आने से पहले जीत का ट्रायल वर्जन

 

मतदान खत्म होते ही देश में एक अदृश्य सी सीटी बजती है…“अब अनुमान लगाओ।” उधर ईवीएम आराम कर रही होती हैं, इधर टीवी स्टूडियो और मोबाइल स्क्रीन पर परिणामों की दौड़ शुरू हो जाती है। पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरलम् के वोट गिने भी नहीं गए होते, लेकिन जीत-हार की भाषा पूरी परिपक्वता के साथ बोली जाने लगती है। जैसे नतीजे कहीं रखे हों और बस औपचारिक घोषणा बाकी हो।

एग्जिट पोल दरअसल भारतीय राजनीति का “ट्रायल वर्जन” है। पूरा सॉफ्टवेयर आने से पहले उसका डेमो। इसमें सब कुछ होता है। ग्राफिक्स, सीटें, रुझान, विश्लेषण। बस एक चीज़ नहीं होती और वो है अंतिम सच्चाई। लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती भी है, क्योंकि जहां सच्चाई नहीं होती, वहां कल्पना की गुंजाइश बहुत होती है।

आंकड़ों का आत्मविश्वास जैसे खुद वोट डलवाकर आए हों

एग्जिट पोल में जो चीज़ सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, वह है उनका आत्मविश्वास।

“स्पष्ट बहुमत…”

“ऐतिहासिक जीत…”

“निर्णायक जनादेश…”

यह शब्द ऐसे निकलते हैं, जैसे आंकड़े नहीं, अनुभव बोल रहा हो।

 

कभी-कभी लगता है कि एग्जिट पोल करने वाली सर्वे टीम सिर्फ सर्वे नहीं करती, बल्कि वोटिंग बूथ के पास खड़े होकर मतदाता से धीरे से पूछ भी लेती होगी…“देखिए, आपने वोट तो डाल दिया, अब बता दीजिए, हम किसे जिता दें?”

 

हर एग्जिट पोल अपनी जगह सही होने के दावे करता है। एग्जिट पोल की दुनिया में गलत होना लगभग असंभव है। अगर नतीजे मिल गए तो दावा “हमने पहले ही कहा था।” अगर नहीं मिले तो “हमने ट्रेंड बताया था, सीटें तो बदलती रहती हैं।”

 

यह एक ऐसा खेल है, जहां हर खिलाड़ी मैच के बाद विजेता बन जाता है। किसी ने 180 सीट बताई, किसी ने 120 और अगर असली नतीजा 150 आ गया, तो दोनों कह सकते हैं। “देखिए, हम करीब थे।” यह “करीब” शब्द एग्जिट पोल का सबसे भरोसेमंद साथी है। ‘अगर’ और ‘लेकिन’ जैसे शब्द तो इन भविष्यवाणी का बीमा ही हैं।। एग्जिट पोल की भाषा में ये दो शब्द बहुत सम्मानित होते हैं।

“अगर यह ट्रेंड कायम रहा…”

“लेकिन अंतिम परिणाम अलग भी हो सकते हैं…”

इन दोनों के बीच पूरी भविष्यवाणी सुरक्षित रहती है। यानी कहा भी जा रहा है, और संभाला भी जा रहा है।

कुछ वैसा ही जैसे कोई कहे “आप पास भी हो सकते हैं, और फेल भी।”

 

यह गंभीरता से मनोरंजन लेने की कला भी है। एग्जिट पोल देखने वाला दर्शक एक खास किस्म का धैर्य विकसित कर लेता है। वह जानता है कि जो दिख रहा है, वह अंतिम नहीं है, फिर भी वह पूरी गंभीरता से उसे देखता है।

 

एक चैनल कहता है “सरकार बदल रही है।” दूसरा कहता है “सरकार लौट रही है।” दर्शक रिमोट को देखता है, फिर चैनल को, फिर खुद को और धीरे से समझ जाता है कि यह सूचना कम, अनुभव ज्यादा है। टीवी स्टूडियो में इस समय जो संवाद चलता है, वह बहुत शालीन होता है। कोई चिल्लाता नहीं, सब मुस्कुराते हैं और हर कोई अपनी जीत को बहुत विनम्रता से स्वीकार करता है।

“जनता ने हमें आशीर्वाद दिया है…”

“हम पूरे बहुमत से सरकार बना रहे हैं…”

यहां तक कि जो पार्टी तीसरे नंबर पर दिखाई जा रही होती है, वह भी कहती है।

“अंतिम नतीजे चौंकाने वाले होंगे।”

इस “चौंकाने” शब्द में इतनी संभावनाएं छिपी होती हैं कि कोई भी स्थिति उसमें फिट हो सकती है।

 

अब एग्जिट पोल सिर्फ एजेंसियों तक सीमित नहीं हैं। हर मोबाइल में एक छोटा-सा “विश्लेषण केंद्र” खुल चुका है। कोई कहता है “मेरे ग्राउंड सोर्सेस कह रहे हैं…”,कोई कहता है “मैंने डेटा एनालिसिस किया है…” इन “ग्राउंड सोर्सेस” की खासियत यह है कि वे हमेशा सही समय पर सक्रिय होते हैं। मतदान के बाद और नतीजों से पहले।

 

इस पूरे आयोजन में सबसे दिलचस्प भूमिका उस व्यक्ति की है, जिसने वास्तव में वोट डाला है। वह कहीं दिखाई नहीं देता, लेकिन वही सबका आधार है। वह टीवी देखता है, सोशल मीडिया स्क्रॉल करता है और शायद मन ही मन सोचता है। “मैंने तो चुपचाप वोट दिया था, ये सब इतनी जल्दी कैसे जान गए?” उसकी यह चुप्पी ही एग्जिट पोल का सबसे बड़ा रहस्य है।

 

एग्जिट पोल को अगर पूरी गंभीरता से लिया जाए, तो वे परेशान कर सकते हैं लेकिन अगर उन्हें हल्के अंदाज में देखा जाए, तो वे बेहद दिलचस्प हो जाते हैं। यह अनुमान का एक दिलचस्प और अद्भुत सौंदर्य भी है। वे हमें यह बताते हैं कि अनुमान भी एक कला है। जहां थोड़ी जानकारी, थोड़ा अनुभव और थोड़ा आत्मविश्वास मिलकर एक पूरी कहानी बना देते हैं।

 

एग्जिट पोल एक तरह से वह अभ्यास हैं, जिसमें नतीजे आने से पहले ही जीत और हार का रिहर्सल हो जाता है। किसी को पहले ही खुशी मिल जाती है, किसी को पहले ही चिंता और असली परिणाम जब आते हैं, तो सभी अपने-अपने भावों को थोड़ा-थोड़ा समायोजित कर लेते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे दिलचस्प बात यही है कि लोकतंत्र अपने सबसे गंभीर क्षण में भी मुस्कुराने का मौका दे देता है। बस देखने का नजरिया थोड़ा हल्का होना चाहिए।      (विनायक फीचर्स)

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