संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
विज्ञान की नजर से इतिहास का सच: 3D इमेजिंग ने सुलझाया वाग्देवी और मां गायत्री की प्रतिमा का 900 साल पुराना रहस्य।
इतिहास की परतें जब आधुनिक तकनीक के स्पर्श से खुलती हैं, तो सदियों पुराने स्थापित सच भी एक नए और विस्मयकारी रूप में हमारे सामने आते हैं। मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक परमार कालीन नगरी धार से प्राप्त और भोपाल के स्टेट म्यूजियम (राज्य संग्रहालय) में संरक्षित 12वीं सदी की एक सुंदर लाल बलुआ पत्थर की प्रतिमा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। पिछले लगभग 900 वर्षों से पुरातत्वविद, कला समीक्षक और आम जनमानस जिसे विद्या की देवी वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा मानकर शोध और वंदन कर रहे थे, वह अत्याधुनिक हाई-रिजॉल्यूशन 3D डिजिटल मैपिंग और वैज्ञानिक जांच के बाद वेदों की माता, देवी गायत्री की अत्यंत दुर्लभ प्रतिमा सिद्ध हुई है। इतिहास और मूर्तिकला (आइकोनोग्राफी) के संसार में इसे इस सदी की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी खोजों में से एक माना जा रहा है।
इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने और प्रतिमा के वास्तविक स्वरूप को उजागर करने में सबसे बड़ी भूमिका अत्याधुनिक 3D इमेजिंग तकनीक ने निभाई है। पुरातत्वविदों ने जब उच्च क्षमता वाले लेजर स्कैनर्स और कैमरों की मदद से मूर्ति के एक-एक सूक्ष्म कोण को रिकॉर्ड किया, तो मूर्तिकला के कई ऐसे अनछुए पहलू सामने आए जो अब तक इंसानी आंखों से ओझल थे। प्रतिमा की इस डिजिटल पहचान में सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बना मूर्ति के हाथों में संगीत की देवी की पहचान कही जाने वाली ‘वीणा’ का न होना। 3D मैपिंग से स्पष्ट हुआ कि ललितासन मुद्रा में बैठी इस चतुर्भुजी देवी के हाथों में वीणा नहीं, बल्कि वेद, कमल और एक पवित्र जपमाला है। जब पुरातत्वविदों ने इन प्रतीकों का मिलान प्राचीन भारतीय ग्रंथों जैसे ‘श्रीमद्देवीभागवत पुराण’ और शिल्पशास्त्र के नियमों से किया, तो यह शत-प्रतिशत मां गायत्री के शास्त्रीय स्वरूप से मेल खा गया। इस प्रतिमा के पास बना हुआ हंस भी केवल कलात्मक प्रतीक नहीं, बल्कि देवी गायत्री की आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता का परिचायक बनकर उभरा।
यह खोज इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण और दिलचस्प हो जाती है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से धार की भोजशाला और वाग्देवी का संबंध अटूट रहा है। राजा भोज द्वारा स्थापित धार की ऐतिहासिक भोजशाला से वाग्देवी सरस्वती की जो मुख्य और बड़ी चमत्कारी प्रतिमा प्राप्त हुई थी, वह वर्तमान में ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन की शोभा बढ़ा रही है। ऐसे में भोपाल संग्रहालय की इस प्रतिमा को भी लंबे समय तक उसी कालखंड और क्षेत्र से जुड़े होने के कारण सरस्वती का ही रूप मान लिया गया था। लेकिन विज्ञान ने इस बार कला के पारखियों को एक नया दृष्टिकोण दिया है।
मूर्तिकला या आइकॉनोग्राफी के क्षेत्र में इस नई खोज का महत्व असीमित है। भारत की प्राचीन मूर्तिकला को गहराई से जानने के लिए अब तक हम केवल प्रत्यक्ष दृश्यता या लिखित दस्तावेजों पर निर्भर थे, लेकिन अक्सर समय की मार, घिसावट या प्राकृतिक कारणों से मूर्तियों के बारीक चिन्ह अस्पष्ट हो जाते हैं। 3D इमेजिंग और लेजर स्कैनिंग तकनीक पत्थरों पर उकेरी गई उन सूक्ष्म रेखाओं, गहराई और प्राचीन शिल्पकारों के औजारों के निशानों को भी पकड़ लेती है, जिन्हें सामान्य रूप से देखना असंभव होता है। यह तकनीक देश और दुनिया के अलग-अलग संग्रहालयों में रखी हमारी प्राचीन धरोहरों के पुनर्मूल्यांकन का एक सशक्त मार्ग प्रशस्त करती है। इसकी सहायता से न केवल मूर्तियों के सही आयु-काल का निर्धारण किया जा सकता है, बल्कि देवी-देवताओं के आयुधों (शस्त्रों या प्रतीकों) की सटीक पहचान करके उनके सही आध्यात्मिक और शास्त्रीय स्वरूप को पुनर्स्थापित किया जा सकता है।
इस संपूर्ण खोज का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व यह है कि इसने भारत में मां गायत्री की मूर्ति पूजा के एक बेहद दुर्लभ और प्राचीन प्रमाण को हमारे सामने रखा है। भारतीय कला के इतिहास में मां गायत्री की स्वतंत्र और इतनी भव्य प्राचीन प्रतिमाएं उंगलियों पर गिनने लायक ही मिलती हैं। 12वीं सदी की यह प्रतिमा दर्शाती है कि उस कालखंड के शिल्पकार शास्त्रों के गूढ़ ज्ञान और शिल्पशास्त्र के जटिल नियमों में कितने निपुण थे। यह खोज हमें यह भी सिखाती है कि इतिहास कोई जड़ वस्तु नहीं है, बल्कि निरंतर शोध और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से विकसित होने वाली एक जीवंत विधा है। भोपाल के संग्रहालय में रखी यह प्रतिमा अब केवल एक मूक पाषाण खंड नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय मेधा, आध्यात्मिकता और आधुनिक तकनीक के अद्भुत मिलन की एक सजीव गाथा बन गई है जो आने वाली पीढ़ियों को हमारी समृद्ध विरासत को एक नई दृष्टि से देखने के लिए प्रेरित करती रहेगी।






