जंगल के भूतपूर्व राजा का नया पेशा: फुल-टाइम मॉडल और पार्ट-टाइम वाइल्डलाइफ।

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संजय सोंधी

(संयुक्त निदेशक)

शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार

 

          (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

जंगल के भूतपूर्व राजा का नया पेशा: फुल-टाइम मॉडल और पार्ट-टाइम वाइल्डलाइफ।

 

 

जब भी 29 जुलाई की तारीख आती है, हमारे जंगल के ‘पूर्व राजा’ यानी बाघ साहब अपनी गुफा के बाहर आकर लंबी उबासी लेते हैं और सोचते हैं कि आज फिर इंसानों का ‘टाइगर डे’ आ गया। पुराने जमाने में जब बाघ दहाड़ता था, तो पूरे जंगल के साथ-साथ आसपास के गांवों में भी सन्नाटा पसर जाता था। लोग डर के मारे मन्नतें मांगते थे कि हे भगवान, आज बाघ महाराज का दर्शन न हो। लेकिन आज जमाना बदल चुका है। अब बाघ गुफा से बाहर झांकता भी है, तो सामने चार-पाँच जिप्सियों में भरे दो-तीन सौ इंसान लंबे-लंबे कैमरों के लेंस ताने खड़े मिलते हैं। बाघ मन ही मन सोचता है कि भाई, मैं तो बस सुबह फ्रेश होने निकला था, यहाँ तो बिना लाल कालीन बिछाए मेरा ‘रेड कार्पेट वॉक’ शुरू हो गया!

 

आज के दौर में बाघों की हालत उस रिटायर्ड राजनेता जैसी हो गई है, जिसकी ताकत तो नाममात्र की बची है, लेकिन उसकी फोटो खिंचवाने की मांग बाजार में सबसे ज्यादा है। इंसान भी बड़े विचित्र जीव हैं। वे पहले तो बाघों का पूरा घर यानी जंगल काट डालते हैं, फिर उस कटी हुई जमीन पर एक आलीशान रिजॉर्ट बनाते हैं और उसका नाम रखते हैं—‘द रोअरिंग टाइगर रिसॉर्ट’! इसके बाद उसी रिसॉर्ट के वातानुकूलित कमरे में बैठकर पर्यावरण सुरक्षा पर बड़ी-बड़ी संगोष्ठियां आयोजित करते हैं। बाघ बेचारा झाड़ी की आड़ से यह सब देखता है और सोचता है कि गजब की मेहमाननवाजी है, मेरा घर छीनकर मेरे ही नाम का बोर्ड लगा दिया और अब मुझे ही देखने के लिए पाँच हजार रुपये का टिकट बेच रहे हैं!

 

अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर तो रौनक ही अलग होती है। दुनिया भर के इंसानी नेता, पर्यावरणविद और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स बाघों की गिरती संख्या पर आँसू बहाते हैं। वे बड़े-बड़े भाषण देते हैं कि ‘बाघ बचाओ, देश बचाओ!’ पर जैसे ही भाषण खत्म होता है, वे उसी फोर-लेन हाईवे से घर लौटते हैं जो बाघ के मुख्य गलियारे को दो टुकड़ों में काटकर बनाया गया है। अब बाघ सोचता है कि रास्ते पर से गुजरूँ तो हाईवे की तेज गाड़ियां उड़ा देंगी और जंगल में रहूँ तो कोई न कोई इन्फ्लुएंसर रील्स बनाने के लिए पीछे पड़ जाएगा। कभी-कभी तो बाघों को लगता है कि उन्हें जंगल के राजा पद से आधिकारिक इस्तीफा देकर किसी कॉर्पोरेट कंपनी में ‘सहानुभूति अधिकारी’ बन जाना चाहिए।

 

आजकल के बाघों की अपनी अलग ही शिकायतें हैं। वे आपस में बैठकर चर्चा करते हैं कि ‘यार, पहले शिकार ढूंढना मुश्किल था, अब एकांत ढूंढना मुश्किल है।’ जैसे ही कोई बाघ पानी पीने तालाब पर जाता है, गाइड चिल्लाने लगते हैं—‘सर, लेफ्ट देखिए, झाड़ी के पीछे मुंडी हिला रहा है!’ बाघ को लगता है कि क्या अब शांति से पानी पीना भी अपराध है? ऊपर से इंसानों ने उनके गले में तरह-तरह के जीपीएस कॉलर टांग रखे हैं। बाघ को लगता है कि राजा तो दूर की बात है, अब तो वो जंगल का सबसे ज्यादा ट्रैक किया जाने वाला ऐसा प्राणी बन चुका है, जिसकी लोकेशन हर वक्त इंसानी कंट्रोल रूम में ब्लिंक करती रहती है।

 

अगर आज बाघों की कोई पंचायत बुलाई जाए, तो उनका पहला प्रस्ताव यही होगा कि कृपया हमारे लिए भाषण देना और डिजिटल पोस्टर बनाना बंद करें, बस हमारे बचे-कुचे जंगल लौटा दें। हमें आपकी ‘टाइगर सफारी’ की कोई भूख नहीं है और न ही हमें इंस्टाग्राम पर ‘ट्रेंडिंग रील्स’ का हिस्सा बनना है।

 

हमें बस इतना सुकून दे दो कि हम बिना किसी कैमरे के फ्लैश के चैन की नींद सो सकें। लेकिन इंसानी फितरत देखकर बाघों को भी समझ आ गया है कि जब तक इंसान हैं, ‘राजा’ को केवल मॉडल बनकर ही पेट पालना पड़ेगा!

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