नारी-कृति

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चन्द्रमती चतुर्वेदी (चन्दू)

   बस्ती,  अयोध्या धाम

 

 

          (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

नारी-कृति

 

हाँ, स्वीकार हूँ मैं करती,

जन्मसिद्ध मैं नारी हूँ,

शक्ति की देवी कहलाती,

पूजित अधिकार हक वाली हूँ।

लक्ष्मी, दुर्गा, काली बनकर,

असुरों पर भारी हूँ,

न्याय-विरुद्ध जो खड़ा हुआ,

काल-रूप बन मारी हूँ।

न्याय-प्रियता नाम हमारा,

जग की मैं महतारी हूँ,

जन-जन के जीवन की आशा,

ममता की फुलवारी हूँ।

सृष्टि-सृजन की प्रथम शक्ति हूँ,

जग की पालनहारी हूँ,

हाँ, स्वीकार हूँ मैं करती,

जन्मसिद्ध मैं नारी हूँ।

हाँ, मैं नारी हूँ।

 

 

कमजोर मुझे अबला मत समझो,

दायित्व-पूर्ण अवतारी हूँ,

नहीं भूल से कमजोर समझना,

मैं तो पालनहारी हूँ।

अन्नपूर्णा है नाम हमारा,

सबकी जीवनदानी हूँ,

माँ-धरा के रूप में पूजित,

सबका भार उठाती हूँ।

कंधों पर संसार उठाकर,

फिर भी हँसती जाती हूँ,

मन के भीतर दर्द छिपाकर,

सबके आँसू पोछने वाली हूँ।

थक जाती हूँ कभी-कभी तो,

फिर भी उफ तक न करती हूँ,

अपने हिस्से की खुशियाँ देकर,

जग की खुशियाँ भरती हूँ।

देख रूप अपने बच्चों का,

वारी-वारी जाती हूँ,

उनकी खातिर हर मुश्किल से,

हँसकर मैं लड़ जाती हूँ।

हाँ, स्वीकार हूँ मैं करती,

जन्मसिद्ध मैं नारी हूँ,

हाँ, मैं नारी हूँ।

 

 

मैं बेटी बनकर घर में आती,

आँगन की किलकारी हूँ,

बहना बनकर स्नेह लुटाती,

रिश्तों की फुलवारी हूँ।

पत्नी बनकर साथ निभाती,

जीवन की सुखकारी हूँ,

माँ बनकर ममता बरसाती,

बच्चों की रखवाली हूँ।

बहू बनकर कुल की मर्यादा,

प्रेम-सुधा की प्याली हूँ,

हर रिश्ते को प्रेम से सींचूँ,

ऐसी मैं संस्कारी हूँ।

रिश्तों के इस पावन जग में,

प्रेम-डोर की क्यारी हूँ,

त्याग, तपस्या, धैर्य, समर्पण,

इन सबसे मैं न्यारी हूँ।

हाँ, स्वीकार हूँ मैं करती,

जन्मसिद्ध मैं नारी हूँ,

हाँ, मैं नारी हूँ।

 

 

झाँसी वाली रानी बनकर,

रण में भी तलवार उठाऊँ,

दुर्गा बनकर दुष्टों के आगे,

अपना शौर्य दिखाऊँ।

सीता जैसी धैर्य-धरा हूँ,

सावित्री-सी अडिग खड़ी हूँ,

मीरा जैसी प्रेम-भक्ति हूँ,

सत्य-पथ पर आज खड़ी हूँ।

गार्गी बनकर ज्ञान बाँटूँ,

वेदों की अधिकारी हूँ,

कल्पना बनकर नभ को छू लूँ,

उड़ने को तैयार खड़ी हूँ।

बंधन मुझको रोक न पाएँ,

मैं खुद अपनी चिंगारी हूँ,

युग बदले तो रूप बदल दूँ,

मैं परिवर्तनकारी हूँ।

हाँ, स्वीकार हूँ मैं करती,

जन्मसिद्ध मैं नारी हूँ,

हाँ, मैं नारी हूँ।

 

 

मुझको दया नहीं अधिकार दो,

इतना ही बस कहना है,

मेरे सपनों को पंख मिले,

इतना मेरा गहना है।

शिक्षा दो, सम्मान दो मुझको,

अवसर दो उड़ने का,

मेरी राह न रोको जग में,

हक दो आगे बढ़ने का।

बेटी हूँ तो बोझ नहीं मैं,

घर की शुभ उजियारी हूँ,

मुझमें ही तो कल की दुनिया,

मुझमें नई तैयारी हूँ।

जिस दिन नारी हँसेगी खुलकर,

सचमुच जीत तुम्हारी है,

नारी का सम्मान जहाँ हो,

वही सभ्यता हमारी है।

हाँ, स्वीकार हूँ मैं करती,

जन्मसिद्ध मैं नारी हूँ,

 

 

नहीं किसी से कमतर जग में,

मैं खुद अपनी अधिकारी हूँ।

शक्ति, भक्ति और प्रेम-सुधा की,

मैं अमिट कहानी हूँ,

सृष्टि-सृजन की मूल चेतना,

मैं जीवन की निशानी हूँ।

हाँ, स्वीकार हूँ मैं करती,

जन्मसिद्ध मैं नारी हूँ,

गर्व से कहती आज जगत से—

हाँ, मैं नारी हूँ।

हाँ, मैं नारी हूँ।

 

 

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