राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
दिमागी खुशी खोजिए,,
(कहानी)
एक छोटे से कस्बे में राधा नाम की एक विधवा रहती थी। उसके पति की मृत्यु के बाद घर की हालत ऐसी हो गई थी कि रोटी भी कभी-कभी दो वक्त की मुश्किल से जुटती थी। दो छोटे बच्चे थे एक बेटा और एक बेटी दोनों स्कूल जाते थे फटे कपड़ों में, और राधा दिन भर दूसरों के घरों में बर्तन माँजती, कपड़े धोती।
एक दिन बाजार में एक अजीब सा आदमी आया। उसके सिर पर एक बड़ा सा बोरा था। वह गली-गली घूमकर चिल्ला रहा था,, खुशी बेचता हूँ! खुशी बेचता हूँ! सस्ता भाव! लोग हँसते थे। कोई कहता “पागल है, कोई कहता—“शराबी होगा ! राधा भी पहली बार में मुस्कुराई, फिर सोच में पड़ गई। वह आदमी उसके पास रुका।
“बहन, खुशी खरीदोगी?”
राधा ने धीरे से पूछा, “कितने में?”
जो भी दे सको। पैसे, अनाज, कपड़ा… कुछ भी।
राधा के पास कुछ नहीं था उसने अपनी पुरानी साड़ी का पल्लू खोला उसमें दो मुट्ठी चावल थे शाम की रसोई के लिए बचाए हुए उसने वे चावल आदमी के हाथ में रख दिए।
आदमी ने बटुआ खोला,अंदर सिर्फ खाली हवा थी, उसने मुट्ठी भर हवा निकालकर राधा की हथेली पर रख दी और बोला -ले लो। अब तुम्हारे घर में खुशी आएगी। राधा लौट आई। बच्चों ने पूछा, “माँ, आज क्या लाई?” उसने मुस्कुराकर कहा, “खुशी।”
उस रात बच्चों ने भूखे पेट सोए पर अजीब बात यह थी कि दोनों बच्चों के चेहरे पर पहले जैसी उदासी नहीं थी। वे हँस रहे थे। “माँ, कल हम स्कूल में सबको बताएँगे कि माँ ने खुशी खरीदी है। अगले दिन वही आदमी फिर आया। इस बार वह कुछ और चिल्ला रहा था- दुःख खरीदता हूँ! दुःख खरीदता हूँ! अच्छा दाम दूँगा!” लोग फिर हँसे। कोई बोला “अब पागलपन और बढ़ गया।” पर राधा के पड़ोसी रामलाल ने सोचा शायद सच में कुछ है। उसके घर में बहुत दुःख था,बीमार पत्नी, कर्ज, बेरोजगारी, उसने आदमी को बुलाया।
मेरा सारा दुःख ले लो, जितना चाहो दाम लो। आदमी ने कहा, “सिर्फ एक मुस्कान दो, बस !
रामलाल हैरान रह गया, “मुस्कान? मेरे पास तो दुःख ही दुःख है।
आदमी मुस्कुराया, “तो फिर दुःख बेचना आसान नहीं है क्योंकि दुःख बेचने के लिए भी थोड़ी खुशी चाहिए।”
रामलाल समझ नहीं पाया, वह लौट गया। रात भर सोचता रहा, सुबह जब उठा, तो बच्चों को देखकर हल्की सी मुस्कान आ गई। उसने उसी मुस्कान को संभालकर रखा। शाम को फिर आदमी के पास गया और बोला
“लो, ये मुस्कान। अब मेरा दुःख ले लो।”
आदमी ने मुस्कान ले ली और बटुए में बंद कर दी, रामलाल के कंधों से जैसे कोई भारी बोझ उतर गया। वह घर लौटा तो पत्नी ने पूछा, “आज चेहरा चमक रहा है?” उसने बस इतना कहा, “आज मैंने दुःख बेच दिया।”
कस्बे में धीरे-धीरे बात फैल गई। लोग समझने लगे, खुशी कोई बाजार की चीज नहीं है। वह तब मिलती है जब इंसान दूसरों के लिए कुछ छोड़ता है और दुःख तब जाता है जब इंसान उसके बावजूद मुस्कान बचाने की हिम्मत रखता है।
कुछ दिन बाद वह आदमी गायब हो गया। लोग कहते हैं कि वह कभी नहीं आया। पर कस्बे में एक बात हमेशा याद रही। संसार में सौदे बहुत होते हैं। सोना-चाँदी, जमीन-जायदाद, नाम- शोहरत, सब बिकता है। मगर खुशी बेचने वाला और दुःख खरीदने वाला… वो बाजार में नहीं मिलता, वो तो अपने ही दिल में मिलता है।







