राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
सोच से सम्भावनाओं तक का सफर
रमेश एक छोटे से कस्बे का साधारण युवक था। रोज सुबह चाय की दुकान पर बैठकर वह अखबार पढ़ता और सोचता क्या मैं भी कभी कुछ कर सकता हूं या कुछ अपना बना पाऊँगा?
एक दिन उसके मन में एक ख्याल कौंधा, कस्बे में ताजी सब्जियाँ और फल सस्ते में उपलब्ध थे, लेकिन शहर तक पहुँचने में बहुत नुकसान हो जाता था। उसने सोचा अगर मैं इन सब्जियों को पैक करके सीधे शहर के होटलों और घरों तक पहुँचाऊँ तो?” सोच तो आ गई, पर संभावनाएँ दूर थीं। पैसे नहीं थे, अनुभव नहीं था, और लोग हँसते थे तुम क्या बिज़नेस करोगे? पहले खुद का गुजारा कर लो।”
रमेश कई रातें जागकर बैठा रहा। डर था असफलता का, लोगों के तानों का, पैसे डूब जाने का। पर एक रात उसने खुद से कहा-
सोच अगर सिर्फ़ सोच बनकर रह गई, तो संभावना कभी नहीं आएगी, हौसला तो करना ही पड़ेगा।
अगली सुबह उसने अपनी माँ की गिफ्ट की पुरानी साइकिल निकाली, थोड़ी सब्जी बाजार से ली और शहर की ओर चल पड़ा। पहले दिन कुछ नहीं बिका दूसरे दिन भी, तीसरे दिन एक छोटे होटल वाले ने दो किलो टमाटर ले लिए।
बधीरे-धीरे ग्राहक बढ़ने लगे कभी बारिश में भीगकर, कभी धूप में तपकर, कभी थकान से गिरकर भी वह फिर उठता हर ठोकर पर रो, गाकर उसका हौसला और मजबूत होता गया।
अथक मेहनत और मृदु स्वाभाव से दो साल बाद रमेश के पास दो छोटे वैन थे और बीस से ज्यादा लोग उसके साथ काम करते थे। कस्बे के लोग अब कहते देखा? सोच ही तो थी… पर हौसला था इसलिए संभावना बन गई।
लोग उसकी सफलता का राज़ पूछते तो रमेश मुस्कुराता और कहता सोच से संभावनाओं तक का सफर आसान नहीं होता। बीच में हौसलों का पुल होता है जो पार कर लेता है, वही सफलता की चोटी पर पहुँचता है।
आज युवा छोटी छोटी बातों से हतोत्साहित हो रहें हैं,, किसी का ब्रेकअप से मुंह लटका है तो किसी का दाम्पत्य जीवन ठीक नहीं, किसी की शादी के बाद बच्चे पैदा नहीं हो रहे, कोई जॉब से असंतुष्ट अर्थात जितने लोग उतनी ही परेशानियां,, रमेश जैसे लोग आदर्श नहीं प्रेरक हैं।
मेरे केंद्रीय जेल अधीक्षक के दौरान हजारों कैदी रिहा होकर आत्म सम्मान भरा जीवन जी रहें है।





