राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
रहिमन, पानी रोकिये!
(लेख)
इस साल (2026) की भारी और तीव्र बारिश ने वाकई देश के कई नगरों और स्मार्ट सिटी की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। मुंबई, बेंगलुरु, दिल्ली, सूरत, हैदराबाद, गुरुग्राम, लखनऊ ,रायपुर ,बिलासपुर जैसे शहरों में जलभराव, ट्रैफिक ठप होना और जान-माल का नुकसान आम खबरें बन गईं। Smart Cities Mission में लगभग ₹1.47 लाख करोड़ खर्च होने के बावजूद मूलभूत ड्रेनेज और नियोजन की समस्याएँ बनी हैं।
मुख्य कारण सिर्फ बारिश की मात्रा नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय में अत्यधिक तीव्र वर्षा (short-duration high-intensity) बढ़ रही है, जबकि शहरों की नालियाँ पुरानी क्षमता (अक्सर 12-20 मिमी/घंटा) के लिए बनी हैं। अनियोजित शहरीकरण, झीलों-नलों पर अतिक्रमण, कंक्रीटीकरण से पानी के सोखने की जगह कम होना, नालों में कचरा और रखरखाव की कमी बड़ी जिम्मेदार हैं।
प्रशासन कैसे बचाव करे? सबसे पहले तत्काल (प्री-मानसून और मौसम के दौरान) तैयारियाँ हर शहर में फ्लड हॉटस्पॉट मैपिंग और नियमित नाले साफ करना (desilting) अनिवार्य हो। तीसरे पक्ष (third-party) ऑडिट हो ताकि सिर्फ कागजी रिपोर्ट न बने। अर्ली वार्निंग सिस्टम मजबूत करें, IMD के साथ हाइपरलोकल फोरकास्टिंग, IoT सेंसर, AI-आधारित मॉडल (जैसे IIT गांधीनगर का सिस्टम) से 1-3 घंटे पहले जलभराव की भविष्यवाणी की जा सके। कुछ शहर पहले से इस दिशा में काम कर रहे हैं।
पंपिंग स्टेशन, बैकअप पावर और इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीमें तैयार रखें। लो-लाइंग इलाकों में पूर्व-स्थानांतरण योजना बनाई जाए।
दूसरा, बुनियादी ढाँचा और “स्पंज सिटी” अवधारणा के साथ साथ स्टॉर्मवाटर ड्रेनेज की क्षमता बढ़ाएँ ताकि 50-100 मिमी/घंटा की बारिश संभाल सके। मुंबई जैसे शहरों में ₹13,000 करोड़ के एकीकृत फ्लड मिटिगेशन प्लान में यही फोकस है, काम पूरा कब होगा ? पता नहीं है।
तीसरे, नेचर-बेस्ड सॉल्यूशंस झीलों-वेटलैंड्स का पुनर्जीवन, बायो-रिटेंशन पार्क, परमीएबल (पानी सोखने वाले) पेवमेंट, डिटेंशन-इनफिल्ट्रेशन टैंक। पानी को रोककर धीरे-धीरे जमीन में जाने दें, न कि सिर्फ निकाल दें। साथ ही रेनवाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य और प्रभावी बनाएँ। नए निर्माण में कंक्रीट की जगह ग्रीन स्पेस और ओपन ग्राउंड महा नगर निगम अनिवार्य करें।
चौथे, नियोजन और शासन सुधार करे, मास्टर प्लान में बाढ़ जोखिम को मुख्यधारा में लाएँ। बाढ़ के मैदानों और प्राकृतिक ड्रेनेज लाइनों पर निर्माण पूरी तरह रोकें। NGT के निर्देशों का सख्ती से पालन हो।अर्बन लोकल बॉडीज (ULB) को वास्तविक वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता दें। AMRUT, Smart Cities और Urban Flood Risk Management Programme के फंड का सही उपयोग सुनिश्चित करें, रखरखाव के लिए स्थायी बजट आबंटन समय पर हो।
एक समर्पित अर्बन फ्लडिंग सेल हर नगर निगम में हो, जो ड्रेनेज, लैंड-यूज और आपदा प्रबंधन का समन्वय करे। NDMA की 2010 अर्बन फ्लड मैनेजमेंट गाइडलाइंस को अपडेट सभी नगर निगम लागू करें।
पांचवां उपाय है तकनीक और नागरिक भागीदारी, GIS, सैटेलाइट इमेजरी और AI से रियल-टाइम मॉनिटरिंग। कमांड सेंटर से ट्रैफिक और रेस्क्यू को निर्देशित करें। नागरिकों को जागरूक करें, नदी नालों में कचरा न फेंकें, स्थानीय स्तर पर पानी रोकने के उपाय अपनाएँ। सार्वजनिक भागीदारी से निगरानी मजबूत होती है।
छठवां उपाय है कि जलवायु अनुकूलन को मुख्यधारा में लाना होगा, नए इंफ्रास्ट्रक्चर को भविष्य की तीव्र बारिश के हिसाब से डिजाइन करें। राज्यों और केंद्र के बीच समन्वय बढ़ाएँ ताकि अलग-अलग योजनाएँ (AMRUT, UFRMP आदि) एकीकृत हों।
उपरोक्त वर्णित उपाय लागू होने पर शहर “फ्लड ट्रैप” से “रेजिलिएंट” बन सकते हैं। समस्या सिर्फ पैसे की नहीं, बल्कि सही प्राथमिकता, रखरखाव, जवाबदेही और प्रकृति के साथ सामंजस्य की है। अगर प्रशासन हर साल सिर्फ प्रतिक्रियात्मक तरीके से काम करता रहा, तो कहर बढ़ता रहेगा। दीर्घकालिक राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्थानीय स्तर पर वास्तविक कार्रवाई जरूरी है।







