अंकुर बाथम, उत्तरप्रदेश
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
इंद्रिय जनित आवश्यकताएं और वास्तविक
मानवीय आवश्यकताएं।
“कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है, तुम्हें वह प्राप्त
करने योग्य लगता है क्योंकि वह तुम्हें प्राप्त नहीं।”
जो भी तुम्हें प्राप्त हो जाए जिसके लिए तुमने बड़े से बड़ा संघर्ष भी किया हो प्राप्त होने के बाद बेहद सामान्य हो जाता है।
चाहे वह धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो, महल हो, सुन्दरतम साथी या प्रेमी या प्रेमिका ही क्यों न हो।
जैसे – सिकंदर ने सारी दुनिया जीतने के बाद, प्रतिष्ठा कमाने के बाद,विशालतम साम्राज्य बनाने के बाद और असीमित धन – संपत्ति अर्जित करने के बाद भी सन्तुष्ट नहीं हुआ।
स्वयं अपना भी उदाहरण लिया जा सकता है, जब तक तुम्हें जो प्राप्त नहीं होता है तब तक तुम्हें लगता है कि वह वस्तु प्राप्त हो जाए तो सर्व सुख प्राप्त हो जाए। लेकिन प्राप्त होने के बाद वह वस्तु बेहद सामान्य हो जाती है।
ऐसा क्यों?
हम जो भी प्राप्त करना चाहते हैं, वह हमारी नहीं बल्कि हमारी इंद्रियों की आवश्यकता होती है। इंद्रियां जिसमें मोटे तौर पर शरीर और मन शामिल होता है । अज्ञानतावश मनुष्य अपने शरीर और मन की आवश्यकताओं को ही स्वयं की आवश्यकता समझ लेता है और जीवन भर इन्हीं इंद्रियों के विषयों के पीछे भागता रहता है। और न केवल इनके पीछे भागता है बल्कि अनैतिक रास्ते पर भी चला जाता है और भ्रष्टाचार, बेईमानी जैसे अनुचित आचरण अपना लेता है। और इतने के बाद भी उसकी ये आवश्यकताएं कभी भी पूरी नहीं होती, उसे सुख शांति प्राप्त नहीं होती और जीवन भर इतनी मसक्कत करने के बाद भी अन्तिम क्षणों में भी उसे बेचैन और अशांत चित्त के साथ ही शरीर त्याग करना पड़ता है क्योंकि उसने जीवन भर जो भी प्राप्त किया वह सब उसकी इंद्रियों और मन की आवश्यकताएं थी। और मन की आवश्यकताएं कभी भी पूरी नहीं होती और न ही मन में वह शक्ति होती कि हम मनुष्य को स्थाई सुख, संतोष और शांति प्रदान कर सके। जैसे कबीर ने कहा है –
गोधन गजधन बाजिधन, और रतनधन खानि।
जब आवै संतोषधन, सब धन धूरि समान॥
अर्थात संतोष रूपी धन आ जाने पर सब धन धूल समान हो जाते हैं।






