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संजय सोंधी

(संयुक्त निदेशक)

शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार

 

              (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

                दिल तो पागल है दिल दीवाना है!

 

                   विश्व हृदय दिवस पर जहाँ दुनिया भर के डॉक्टर ईसीजी, ट्रेडमिल टेस्ट और ऑलिव ऑयल का ज्ञान बाँट रहे हैं, वहीं हमारा दिल सीने में बैठा-बैठा मंद-मंद मुस्कुरा रहा है। डॉक्टरों को लगता है कि दिल बस चार खानों वाला एक पंप है, जो दिन-रात बिना थके खून की सप्लाई करता रहता है। लेकिन सच तो यह है कि यह बेचारा अंग केवल खून का ही नहीं, बल्कि हमारी सारी बेवकूफियों, बहकावों और बचकानो का अकेला ठेकेदार है। शरीर के बाकी अंग तो बड़े सीधे-सादे और व्यावहारिक हैं। दिमाग पूरी तरह बनिया है, हमेशा नफे-नुकसान का हिसाब लगाता है। आँखें सच देखती हैं, कान सच सुनते हैं, लेकिन यह दिल? यह तो पैदाइशी शायर, ड्रामा क्वीन और आवारा पंछी है, जिसका काम ही दिन-रात नई-नई उलझनो में कूदना है।

 

          इसकी फितरत का आलम यह है कि इसे जितने सख्त कानून-कायदे सिखाओ, यह उतना ही बड़ा बागी बन जाता है। डॉक्टर कहते हैं कि इसे मजबूत रखने के लिए उबली हुई सब्जियां खाओ, सुबह-सुबह चार किलोमीटर दौड़ो और तनाव मत लो। पर जैसे ही सामने गरमा-गरम समोसा या जलेबी आती है, इसका इकलौता डायलॉग होता है—”अरे भाई, एक-आध समोसे से कौन सा पहाड़ टूट जाएगा, खा ले!” दिमाग चिल्लाता रहता है कि कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाएगा, पर दिल की जिद के आगे बेचारे दिमाग की एक नहीं चलती। फिर जब समोसा पेट में पहुँच जाता है, तो यही दिल अचानक ‘अपच’ का नाटक करके ऐसा धड़कने लगता है जैसे पूरे मोहल्ले में आग लग गई हो।

 

            दिल की चतुराइयां भी किसी मंजे हुए सियासतदान से कम नहीं हैं। जब इसे किसी से दिल लगी करनी होती है, तो यह इतनी तेजी से उछल-कूद मचाता है कि इंसान को लगता है कि उसे सच्चा प्यार हो गया है। और जब सामने वाला भाव न दे, तो यही दिल अचानक कांच का बर्तन बनकर टूट जाने की एक्टिंग शुरू कर देता है। अब कोई इनसे पूछे कि भाई, जो अंग मांसपेशियों का बना है, वह कांच की तरह कैसे टूट सकता है? पर साहब, ‘दिल टूटने’ का ऐसा मुहावरा गढ़ा गया है कि गजल गायकों से लेकर रोमान्टिक कवियों की रोजी-रोटी इसी टूटे हुए दिल पर टिक गई है। कोई कहता है ‘दिल के टुकड़े हुए हजार’, तो कोई कहता है ‘दिल चीर के देख तेरा ही नाम होगा’। अगर डॉक्टर सच में दिल चीर कर देख ले, तो उसे नाम के बजाय सिर्फ तीन ब्लॉकड आर्टरीज ही नजर आएंगी!

 

                     लेकिन दिल बड़ा ढीठ किस्म का अंग है। यह जितनी जल्दी टूटता है, उतनी ही तेजी से फेविकॉल की तरह वापस जुड़ भी जाता है। कल तक जो दिल किसी के गम में देवदास बना बैठा था, अगले ही हफ्ते किसी नए चेहरे को देखकर फिर से गिटार बजाने लगता है। इसकी इस नटखट और मसखरे स्वभाव के कारण ही बेचारा इंसान जिंदगी भर परेशान रहता है। कभी किसी को देखकर जोर-जोर से धड़कना, तो कभी अचानक किसी की आहट पर ‘धक से’ रह जाना, यह सब इसकी रोजमर्रा की नौटंकी है।

 

       मजबूत दिल की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन असली मजबूत दिल तो वह है जो पड़ोसी की नई गाड़ी देखकर भी नॉर्मल ईसीजी दे दे, या बीवी के शॉपिंग बिल को देखकर बंद न पड़े! इसलिए इस हृदय दिवस पर डॉक्टरों की बात मानकर थोड़ा टहल भले ही लीजिए, लेकिन इस दिल की मासूम और बचकानी हरकतों पर ज्यादा गुस्सा मत कीजिए। 

 

  यह थोड़ा बेवकूफ जरूर है, थोड़ा मसखरा और आवारा भी है, लेकिन जब तक यह सीने में धक-धक करके नखरे दिखा रहा है, तब तक जिंदगी में थोड़ी रौनक और हंसी बाकी है। तो बस, दिल को थोड़ा संभालिए, थोड़ा हँसाइए, और इसके बहकावे में आकर समोसे के साथ-साथ किसी से बेवजह दिल लगाने से थोड़ा बचिए!