संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
छल, कूटनीति और गोलकुंडा का पतन।
अठारहवीं सदी की शुरुआत से ठीक पहले मुगल बादशाह औरंगजेब की दक्षिण नीति अपने चरम पर थी। 1680 के दशक में जब औरंगजेब ने दक्कन में अपना अंतिम और सबसे आक्रामक अभियान छेड़ा, तो उसका मुख्य लक्ष्य शिया रियासतों को खत्म कर समृद्ध भूभाग पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना था। बीजापुर पर जीत दर्ज करने के बाद उसकी नजरें गोलकुंडा रियासत पर टिकीं। गोलकुंडा अपने अकूत धन-धान्य, हीरों की खदानों और रणनीतिक महत्व के लिए दुनिया भर में मशहूर था।
जनवरी 1687 में औरंगजेब की विशाल सेना ने गोलकुंडा के किले को चारों तरफ से घेर लिया। गोलकुंडा का किला बेहद मजबूत ग्रेनाइट की चट्टानों और ऊंची दीवारों से बना था। किले की भव्य बनावट ऐसी थी कि मुगलों के तोपों के गोलों का इस पर कोई विशेष असर नहीं पड़ रहा था। किले की तोपों और दुर्गम मोर्चों के सामने मुगल सेना बेबस साबित हो रही थी। महीनों तक चली इस घेराबंदी के दौरान मुगलों को भारी नुकसान, भुखमरी और रसद की किल्लत का सामना करना पड़ा, लेकिन शिया शासक अबुल हसन ताना शाह की सेना और वफादार सरदारों ने हार नहीं मानी।
जब औरंगजेब को यह आभास हो गया कि सैन्य ताकत और तोपखाने से इस अभेद्य किले को जीतना असंभव है, तो उसने कूटनीति, रिश्वत और चालबाजियों का सहारा लिया। औरंगजेब ने किले के भीतर मौजूद अफगान सरदार अब्दुल्ला खान पन्नी को भारी धन और पदों का लालच देकर अपनी तरफ मिला लिया। लगभग 8 महीने की लंबी घेराबंदी के बाद, 21-22 सितंबर 1687 की रात इस गद्दारी का अंजाम सामने आया। अब्दुल्ला खान ने चुपके से किले के फतेह दरवाजे की एक खिड़की खोल दी, जिससे मुगल सैनिक रात के अंधेरे में किले में घुसने में सफल हो गए।
अचानक हुए इस छलपूर्वक हमले से गोलकुंडा का पतन हो गया। कुतुबशाही वंश के अंतिम शासक अबुल हसन ताना शाह को बंदी बना लिया गया। उन्हें महाराष्ट्र स्थित दौलताबाद किले में कैद कर दिया गया, जहां 12 वर्षों की कड़े कारावास के बाद 1699 में उनका निधन हो गया। गोलकुंडा की यह हार इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सामरिक शक्ति से निष्फल रहने पर औरंगजेब ने साम, दाम, दंड और भेद के हर तरीके का इस्तेमाल कर विजय हासिल की।






