राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
ज्ञानेशकुमार प्रकरण का पटाक्षेप?
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आज देशभर में चटख़ारेदार चर्चा का विषय-विशेष और गंभीर सवाल यही ठहरा बैठा है कि ज्ञानेशकुमार प्रहसन का पटाक्षेप कैसे संभव हो सकता है?
ज्ञानेशकुमार का मामला राष्ट्रीय मनोरंजन का रहस्यमयी झुनझुना बनता जा रहा है। सत्ता-पक्ष और विपक्ष एक दूसरे के विरुद्ध,आरोप-प्रत्यारोप लगाने की नूरा कुश्ती के फर्जी जोराजोरी में, अपनी व्यस्तता प्रदर्शित करते दिखाई दे रहे हैं।
विधि-विषेश का आकलन तो अभी तक यही ज्ञात हुआ है कि उपलब्ध व्यवस्था ज्ञानेशकुमार जी को अपदस्थ नहीं कर सकती है। यहाँ तक कि मौजूदा संसद भी नहीं; क्योंकि मौजूदा संसद का अंकगणित इस प्रकरण के समाधान हेतु सक्षम नहीं है।
न तो पक्ष के साथ और न ही विपक्ष के साथ, संसद में अपने-अपने आशय के समर्थन का,आज इतना सक्षम संख्याबल है कि वे ज्ञानेशकुमार को शिक्षित करने वाला कोई क़दम उठा सकें। लिहाजा होना क्या है?
तब होना क्या चाहिए?
ज्ञानेशकुमार अगर स्वयं कुछ करना चाहेंगे,तो दुनिया की कोई भी शक्ति इस व्यक्ति को किसी भी कोण और दृष्टिकोण से कैसे रोक सकेगी?
लोकसभा-लोकमार्ग वे देखेंगे नहीं और मार्गदर्शन प्राप्त करने के अभिलाषी वे हैं नहीं। ज्ञानेशकुमार जी, अपनी एक अकेली राह के एक अकेले ऐसे राही हैं, जो न कहीं झुकता है और न कहीं रूकता है.फिर भले क्यों नहीं सारा देश ही सड़कों पर उतर आए?
ज्ञानेशकुमार के संदर्भ में मौजूदा संसद का संख्याबल (पक्ष-विपक्ष) पर्याप्त जोड़-तोड़ सहित कुछ कर सकता है, इसमें पर्याप्त सम्मान सहित संदेह है।
ज्ञानेशकुमार ख़ुद ऐसा-वैसा कुछ कर बैठेंगे,इसमें भी पर्याप्त सम्मान सहित संदेह है। वे आत्महंता नहीं हैं.वे कायर नहीं हैं। वे एक दृढ़ आत्म-विश्वासी शख्सियत हैं।
एक सौ चालीस करोड़ जनता का मुख्य चुनाव आयुक्त बना रहना कोई कम बड़ा सिरदर्द नहीं है।
संभव ये हो सकता है कि ज्ञानेकुमार, संसद से सड़क तक के खुल्लमखुल्ला शोर को अनसुना करते रहने के बाद, आत्मा की आवाज सुन लें और आत्मग्लानिवश थोड़ा-बहुत दबाव महसूस करें।
जरुरी तो नहीं है कि लज्जा नामक शब्द हर किसी व्यक्ति के शब्दकोष में होना ही चाहिए. हनुमान का अनुमान संजीवनी बूटी नहीं,पूरा पर्वत ढ़ोने के लिए अभिशप्त है, तथास्तु!
तो क्या बाद इसके देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेशकुमार कुछ उलट-पलटकर स्वेच्छा से इस्तीफ़ा दे सकते हैं?
क्या नहीं ज्ञानेशकुमार प्रहसन का पटाक्षेप ऐसे संभव हो सकता है?









