राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल (भाग-6)
बीते पाँच साल हीरा के जीवन पर काले बादल ग्रहण बनकर छा गए थे। चारों तरफ से घिरी मुसीबतों ने उसे इस कदर तोड़ दिया था कि उसे आगे सिर्फ अंधेरा दिखाई दे रहा था। एक तरफ बड़ी बेटी कला की शादी की चिंता उसे खाए जा रही था, तो दूसरी तरफ मुन्ना की पढ़ाई का खर्च और सबसे बढ़कर देवी की जानलेवा बीमारी में दवाइयों के खर्च और हताशा के बीच हीरा खुद को असहाय महसूस करती और निराशा के इन काले बादलों ने उसके मन में जीने की इच्छा को भी कमजोर कर दिया।
एक दोपहर, जब वह गहरी मानसिक पीड़ा और उदासी में डूबी हुई थी, तभी पास के मकान में बजते रेडियो से वर्ष 1957 की प्रसिद्ध हिन्दी फिल्म ‘मदर इंडिया’ का एक कालजयी गीत गूंज रहा था।
“दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा,
जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा…”
लता मंगेशकर की आवाज में डूबे इन शब्दों ने सीधे हीरा के अंतर्मन पर चोट की, इस गाने ने उसे अहसास कराया कि जीवन की परिस्थितियों से भागना कायरता है। यदि नियति ने उसके हिस्से में संघर्ष लिखा है, तो वह उससे मुंह नहीं मोड़ेगी। फिल्म की नायिका ‘राधा’ की तरह ही हीरा ने भी अपनी तुलना उस मां से की जो हर तूफान से लड़कर अपने बच्चों को पालती है। इस एक गीत ने उसके भीतर सोए हुए स्वाभिमान और साहस को जगा दिया।
गाने से मिली प्रेरणा के बाद हीरा ने हार मानने के बजाय लड़ने का फैसला किया। उसने अपनी बूढ़ी मां और बच्चों को अपने साथ इस संघर्ष में शामिल किया, घर की चौखट के भीतर ही बीड़ी बनाने का काम शुरू हुआ। भोर की पहली किरण से लेकर देर रात मिट्टी तेल की दिआ बत्ती के धुंधलके में पूरा परिवार पत्तों को छांटने/ काटने, तंबाकू भरने और धागा बांधने के काम में जुट जाता। हीरा की उंगलियां बीड़ी बनाते-बनाते छिल जाती थीं, पर उसके चेहरे पर अब लाचारी नहीं, बल्कि एक दृढ़ संकल्प था। इस मेहनत से होने वाली पाई-पाई की कमाई को वह बेहद सहेज कर रखती थी ताकि कला के हाथ पीले हो सकें, देवी को वक्त पर दवा मिल सके और मुन्ना की किताबें खरीदी जा सकें।
कड़े संघर्ष के बीच वह दिन आया जिसने इस परिवार के भविष्य की दिशा बदल दी। मुन्ना अपनी कक्षा पाँच की परीक्षा पास करके घर लौटा उसके नन्हें हाथों में उसकी अंकसूची (रिपोर्ट कार्ड) थी, जिस पर उसकी शानदार सफलता दर्ज थी। जब मुन्ना ने दौड़कर वह अंकसूची अपनी मां हीरा के हाथों में थमाई, तो हीरा का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। बीते पाँच सालों की सारी थकान, रातों की छटपटाहट और उंगलियों के दर्द का कर्ज जैसे इस एक कागज के टुकड़े ने चुका दिया था।
हीरा ने मुन्ना को गले से लगा लिया। उसकी आंखों से खुशी और सिसकियों के आंसू थमे नहीं थम रहे थे। तभी उसकी आंखों से टप-टप गिरते हुए आंसू सीधे मुन्ना की अंकसूची पर जा गिरे वे आंसू केवल पानी की बूंदें नहीं थीं, बल्कि: वह एक मां के तप, त्याग और लहू-पसीने की गवाही थे। उन आंसुओं ने अक्षरों को थोड़ा धुंधला जरूर किया, लेकिन मुन्ना के दिल में एक कभी न मिटने वाली लकीर खींच दी।
मुन्ना ने अपनी मां के उन आंसुओं की कीमत को समझा उसी पल, उस अंकसूची पर गिरे आंसुओं ने मुन्ना की भविष्य की महान सफलता की मजबूत नींव रख दी। उसने मन ही मन संकल्प लिया कि वह अपनी मां के इस संघर्ष को कभी व्यर्थ नहीं जाने देगा और पढ़-लिखकर इस गरीबी के जाल को हमेशा के लिए काट देगा।
अगस्त माह 1968 में रक्षाबंधन के अवसर पर हीरा की रिश्ते की एक बहिन की बेटी नन्नी के घर उसका कुंवारा देवर सेवक उम्र 18 साल के आसपास थी अपनी पसंद की लड़की देखने तिली सागर आया । नन्नी ने हीरा को बताया कि मोसी – मेरा देवर मुहल्ले की अनेक लड़कियां देखा, कोई पसंद नहीं आई है आप कहें तो मैं कला को दिखा दूँ ? हीरा – अरे नन्नी ! कला अभी 13 – 14 साल की है, अभी रहने दो। नन्नी बोली – ठीक मोसी, विवाह बाद में करना, अभी मैं कला को ले जा रही हूँ,,,हीरा हँसते हुए हाँ, बोल देती है।
(शेष भाग आगे)






