आँतरिक बेचैनी का रचनात्मक अवकाश है कविता।

Spread the love

 

 

राजकुमार कुम्भज                                            जवाहरमार्ग, इन्दौर

 

 

            (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                              (w)6395080071

 

 

 आँतरिक बेचैनी का रचनात्मक अवकाश है कविता।

                  ___________________

 

 

              मेरी कविताएँ, मेरी आँतरिक बेचैनी का रचनात्मक अवकाश हैं। अवकाश से आशय और अभिप्राय यही है कि एक बेचैनी से दूसरी बेचैनी के बीच जो अभिव्यक्त हुआ है, वह मुझे कुछ समय के लिए मुक्त करता है और मुक्त रखता है। बाद इसके दूसरी बेचैनी और फिर दूसरी कविता का प्रस्फुटन। कलंक यह है कि हर बेचैनी अधूरी है और हर कविता अधूरी है।

 

                  इसलिए यह कहने और स्वीकारने में मुझे कोई संदेह, परेशानी अथवा दिक्कत नहीं है कि मैं अधूरी कविताओं का अधूरा कवि हूँ। मैं पूर्णतः कवि होने का दावा भी नहीं कर सकता हूँ। ये विनम्रता नहीं, बल्कि एक संवेदनशील संक्षिप्त सच्चाई है।

 

              दूसरी सच्चाई ये है कि कविता जिम्मेदारी सिखाती है। कविता जिम्मेदारी के लिए, जिम्मेदारीपूर्वक लड़ना सिखाती है। कविता सिखाती है कि पृथ्वी सभी का घर है, जिसमें विभिन्न स्तरों पर विभिन्न विविधताएँ सदैव ही गूँजती रहती हैं और कविता ये भी सिखाती है कि अंधेरों के बावजूद उपलब्ध होने वाले उजास पर सभी का बिना शर्त समान अधिकार है।

 

          उजास पर एकाधिकार की अवधारणा का निरंतर प्रतिरोध करना कविता का मूल आचरण है।कविता के इस ऐतिहासिक आचरण में ईमानदारी से विचरण करना कदापि सहज उपक्रम नहीं है। वह एक असामान्यता है। असामान्यता का होना, कविता में लोकतंत्र के लोकार्पण का होना है।

 

          कविता के लोकतंत्र में असामान्यता और असहमति के प्राण बसते हैं। असामान्यता और असहमति के लिए कविता में पर्याप्त सम्मानजनक जगह तथा सहमति जरूरी है, लेकिन अगर असहमति के लिए सम्मान और जगह में संकुचन आ रहा है, तो इसका एक ही अर्थ है कि लोकतंत्र खतरनाक मानव-निर्मित, मानव-विरोधी मोड़ पर है। जहाँ आम आवाजें गायब हैं।जहाँ पुकारती पुकारें गायब हैं। बस एक प्रायोजित भीड़ है चारों ओर, जो विचारहीनता के सौजन्य-सौंदर्य से आच्छादित होकर विकलतापूर्वक कानफोडू शोर मचा देने के लिए अभिशप्त है। ये मामला न सिर्फ असामान्य विस्मयकारी है, बल्कि लोकतंत्र के भविष्य को भी संदिग्ध बनाता है।

 

      कविताओं का संसार असामान्य विस्मयकारी विचित्रताओं से भरा एक ऐसा हाँफता-काँपता संसार है, जिसमें मनुष्यता की खोज निरंतर प्रश्नाकुल बनी रहती है।

 

           मैं क्या कुछ लिखना चाहता हूँ और क्या कुछ लिख जाता हूँ, सच कहता हूॅं कि जरा भी समझ नहीं पाता हूँ। प्रश्न हैं कि निरंतर-निरंतर बनते-बिगड़ते रहते हैं और मैं निरंतर-निरंतर उलझता रहता हूँ। बस यही और इतना ही कह सकता हूँ कि मेरी कविताओं ने मुझे जीवन जीने का वह सलीका और साहस सिखाया है, जो किसी भी पुस्तक में नहीं है।

 

       यहाँ ये कहना जरा भी अन्यथा नहीं है कि समय और समाज से बड़ा दूसरा पुस्तकालय संसार में कहीं भी नहीं है। संसार का यही पुस्तकालय संसार को सब कुछ सिखाता है। मैंने कोशिश की और मैं सीखता गया। मैं सीखता गया और‌ लिखता गया। मैं लिखता गया और भूलता गया। मैं भूलता गया और फिर-फिर लिखता गया। कबीर की भाषा में कहूँ, तो मैं जागता रहा और भागता रहा।

 

         इस तरह लिखने-भूलने और जागने-भागने के बीच, सीखने-समझने की अपार संभावनाओं के कौतुक उपलब्ध हुए, जिसमें हार-जीत को, कुटिलतापूर्वक स्थानांतरित होते देखने की अपार विशेषताएँ, अपार विचित्रताएँ और अपार विविधताएँ देखने को मिली। आश्चर्य यही रहा कि वहाँ मुझे, उनमें, वे सब की सब अपनी ही परछाइयाॅं नजर आईं।

 

वैसे देखा जाए तो परछाइयाँ या तो धूप में नजर आती हैं या कि फिर जल में।

 

दर्पण और कविता में वे जो परछाइयाँ नजर आती हैं, वे तमाम-तमाम परछाइयाॅं कविता की कोशिश हैं।

 

       कविता की कोशिश का नितांत निजी होते हुए भी, नितांत निजी रह पाना नितांत असंभव है और जो असंभव है उसे संभव कर देना राजनीतिक-कला है।

 

            समकालीन राजनीति के विचारहीन कलात्मक आंदोलनकारी समीकरणों ने हर निजता और निजता की सुकोमल आभासी परछाइयों का अपहरण कर लिया है।

 

           ये परछाइयाँ बनते-बनते बिगड़ने लगती हैं, बल्कि बनने से पहले ही बिगाड़ दी जाती हैं। या यों कहें कि स्थापित सत्ताएँ, संभवतः प्रत्येक परिवर्तनकारी वयस्क-विचार की भ्रूण-हत्या का भागीदार बन जाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं।

 

                     इन परछाइयों को देखने-दिखाने की पर्याप्त स्वतंत्रताएँ होती हैं। हर कोई अपनी-अपनी अर्जित‌ परंपराओं, विचारधाराओं तथा सामाजिक-साँस्कृतिक-सँस्कारों के अनुसार अपनी-अपनी परछाइयों का आकलन कर सकता है। चूँकि आजकल धूप और जल के छल अनेक हैं।

 

       किसी भी छल-कपट की महत्ता को कविता सिरे से अस्वीकार करती है, किन्तु सामान्य मनुष्य के सामान्य सामाजिक जीवन में, वे जो तमाम-तमाम अवाँछित-सँस्कारसंपन्न शक्तियाँ सक्रिय हैं, उनके लिए तो उनकी छल-कपटपूर्ण व्यवहार-कुशलताएँ ही अधिक महत्वपूर्ण और मूल्यवान आभूषण हैं।

 

       कविता अगर किसी भी दमन और शोषण के प्रतिरोध में हिस्सेदार नहीं है, तो वह अपनी मौलिक आभा और आजादी के अवमूल्यन का कारण भी सहज ही हो जाती है। मानाकि कविता नारा या बयान नहीं है, लेकिन नारा या बयान बन जाने से कम भी तो नहीं है?

 

कविता की पक्षधरता तथा मनुष्यता की पक्षधरता को आखिर कैसे परिभाषित किया जा सकता है? 

 

            कविता बेचैन हवाओं की भाषा का औजार है। मैं एक कवि हूँ और जैसाकि स्वाभाविक ही है कि मैं अपने समकालीन समाज के आसपास को देख-समझकर बेचैन हो जाता हूँ। एक बेचैनी के बाद दूसरी बेचैनी और फिर इसी संताप में एक कविता के बाद दूसरी कविता का प्रस्फुटन।

 

अंततः और अतएव आग्रह यही है कि मेरी कविताएँ, मेरी आँतरिक बेचैनी का रचनात्मक अवकाश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं।

 

 

  • Related Posts

    कर्मफल (भाग 6)

    Spread the love

    Spread the love  राजेन्द्र रंजन गायकवाड                    (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)                     …

    Spread the love

    Spread the love   सुनील कुमार वर्मा                                             बिलासपुर, छत्तीसगढ़…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    22अक्टूबर से शुभारंभ होने जा रहा है दिव्य “जय गोलज्यू महोत्सव” का, उत्तराखंड के साथ साथ देश के तमाम राज्यों की कला संस्कृति के एक साथ होंगे भव्य दर्शन।

    • By User
    • October 21, 2026
    • 5 views
    22अक्टूबर से शुभारंभ होने जा रहा है दिव्य “जय गोलज्यू महोत्सव” का, उत्तराखंड के साथ साथ देश के तमाम राज्यों की कला संस्कृति के एक साथ होंगे भव्य दर्शन।

    आँतरिक बेचैनी का रचनात्मक अवकाश है कविता।

    • By User
    • October 21, 2026
    • 7 views
    आँतरिक बेचैनी का रचनात्मक अवकाश है कविता।

    कर्मफल (भाग 6)

    • By User
    • October 21, 2026
    • 8 views
    कर्मफल (भाग 6)

    लाखामंडल के गाता खढ में 40 (सिलपर) लकड़ी पकड़े जाने पर हंगामा भाजपा नेत्री बचना शर्मा ने वन विभाग और रेंजर‌ विनोद चौहान पर लगाए भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप।

    • By User
    • October 21, 2026
    • 8 views
    लाखामंडल के गाता खढ में 40 (सिलपर) लकड़ी पकड़े जाने पर हंगामा भाजपा नेत्री बचना शर्मा ने वन विभाग और रेंजर‌ विनोद चौहान पर लगाए भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप।

    23 अक्टूबर से शुरू होगी ईवीएम एवं वीवीपैट की प्रथम स्तरीय जांच।

    • By User
    • October 21, 2026
    • 9 views
    23 अक्टूबर से शुरू होगी ईवीएम एवं वीवीपैट की प्रथम स्तरीय जांच।
    • By User
    • October 21, 2026
    • 7 views