राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल (भाग-8)
गणेश और हीरा कला और सेवक की सगाई की बात शाम को आँगन में बैठकर कर रहें थे।
साधारण ग्रामीण आँगन गोबर लीपा गया था, मिट्टी की दीवारें, चारपाई, कुछ मिट्टी के बर्तन रखें हैं। हीरा बैठी है, कला उसके पास खड़ी है। दो-तीन रिश्तेदार और पड़ोसनें भी बैठी हैं। माहौल उत्सुक लेकिन थोड़ा तनावपूर्ण है।
हीरा (कला के माथे पर हाथ फेरते हुए, मुस्कुराते हुए) बहुत जल्दी सगाई है कला की, सेवक अच्छा लड़का है… अहिरवार समाज का,मुझे कोई डर नहीं।
पड़ोसिन (फुसफुसाते हुए)। हीरा फुआ, सोच-समझकर सगाई करना सरपंच जी बहुत नाराज़ हैं। दूसरी पड़ोसिन – (सिर हिलाते हुए)
जाटव में शादी… समाज नहीं मानेगा। बात फैल गई है पूरे गाँव में,जात से बंद कर देंगे,आपको।
कला- (चिंतित स्वर में) माँ… लोग क्या कह रहे हैं?
हीरा- (दृढ़ता से) लोग जो कहना चाहें, कहें। हम सही हैं। देखते हैं कौन क्या करता है?
तभी आँगन के द्वार पर सरपंच बड़कुल खड़ा हो जाता है। उसके पीछे तीन-चार पंचायत के सदस्य साथ आए हैं। बड़कुल का चेहरा कठोर है। आँगन में अचानक सन्नाटा छा जाता है।
बड़कुल -(सीधे आँगन में घुसते हुए, जोर से)
हीरा! सुन ले साफ़-साफ़। अगर कला का विवाह जाटव समाज के लड़के से कर दिया… तो तुम्हारा परिवार बहिष्कृत कर दिया जाएगा। समाज से बाहर, समझ गई?
सभी रिश्तेदार और पड़ोसनें एक-दूसरे की ओर देखते हैं। कोई बोलने की हिम्मत नहीं करता। कला का चेहरा उतर जाता है।
पड़ोसिन -डरते हुए, (धीमे से)
सरपंच जी सही कह रहे हैं हीरा फुआ … सोच लो।
हीरा – चबूतरे से उठती है। आँखों में डर नहीं, सिर्फ सवाल।
सरपंच जी… पहले भी ऐसे विवाह हुए हैं। आप भूल गए क्या?
बड़कुल -(कठोर स्वर में)
पहले की बात पहले थी, अब समाज नहीं मानेगा। अहिरवार और जाटव अलग हैं,अलग ही रहेंगे। हीरा -एक कदम आगे बढ़कर, साफ़ स्वर में
अलग कैसे? दोनों संत रविदास के वंशज हैं। एक ही मिट्टी, एक ही पीड़ा, एक ही इतिहास,फिर उप-जातियों के नाम पर यह दीवार क्यों खड़ी कर रखी है?
पंचायत के सदस्य एक-दूसरे की ओर देखते हैं। कुछ की नज़रें झुक जाती हैं। बड़कुल की भौंहें चढ़ जाती हैं।
बड़कुल – (चीखकर)
हीरा! अपनी औकात में रह, पंचायत की बात मान ले, वरना…
हीरा – (शांत लेकिन बहुत दृढ़ स्वर में बीच में काटती है) वरना क्या? मुझे बहिष्कृत कर दोगे? कर दो।
मैं अपनी बेटी का भविष्य समाज की धमकियों से नहीं तौलूँगी। कला का विवाह सेवक से ही होगा। तुम्हारी पंचायत चाहे जो फैसला ले… मैं नहीं मानती। तभी आँगन के द्वार पर सेवक उसका बड़ा भाई स्वरूप खड़ा दिखता है। दोनों साधारण लेकिन साफ़ कपड़ों में है। उनके चेहरे पर चिंता और संकोच दोनों हैं। वह अंदर आने को हिचकिचाते हैं।
सेवक – द्वार पर ही खड़े होकर, नम्र स्वर में कहता है,,,माँजी… मैं आ गया हूं,,सुना… सरपंच जी हमारी शादी में ऑब्जेक्शन ले रहें हैं?
सभी की निगाहें सेवक पर टिक जाती हैं। बड़कुल घूमकर सेवक की ओर देखता है।
बड़कुल -(तिरस्कार भरे स्वर में)
तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो? भाग जाओ यहाँ से आपकी वजह से ही यह सब गुड गोबर हो रहा है।
सेवक – थोड़ा आगे बढ़कर, लेकिन सम्मान के साथ, सरपंच जी… मैं किसी से लड़ना नहीं चाहता। लेकिन इस परिवार से मेरा वादा है और माँजी ने मुझे अपना बेटा मान लिया है,तो शादी तो होगी।
हीरा -(सेवक की ओर मुड़कर, गर्व से)
आ जा बेटा, अंदर आऔर बड़े लाला को भी साथ ले आओ।
सेवक धीरे-धीरे अंदर आता है और हीरा के पास खड़ा हो जाता है। कला की आँखों में राहत और थोड़ी सी चमक आ जाती है।
तभी पड़ोसिन (फुसफुसाते हुए)
देखो… सेवक भी आ गया, हीरा तो सच में नहीं मानेगी,बहुत जिद्देल है, फुआ।
बड़कुल -(गुस्से में काँपते हुए)
हीरा… आखिरी बार कह रहा हूँ। यह रास्ता मत चुन,समाज तुझे कभी माफ नहीं करेगा।
हीरा – सेवक और कला दोनों का हाथ पकड़कर, सीधे बड़कुल की आँखों में देखते हुए
समाज जो चाहे करे, मैं अपनी बेटी को उस घर में ब्याहूँगी जहाँ मेरी पसंद है, जहाँ सम्मान है… न कि जहाँ जाति की दीवारें हैं।
जाओ सरपंच जी, तुम्हारा फैसला तुम्हारे पास रहे, मेरा फैसला मेरा है। बड़कुल कुछ पल हीरा को घूरता रहता है। फिर गुस्से में मुड़कर निकल जाता है। उसके पीछे पंचायत के सदस्य भी चले जाते हैं। आँगन में फिर सन्नाटा पसर जाता है। लेकिन इस बार सन्नाटा डर का नहीं, एक गहरी शांति और संकल्प का है।
एक पड़ोसिन (धीरे से, हैरानी से)
हीरा फुआ… तुमने तो सच में मना कर दिया…
हीरा (कला और सेवक की ओर देखते हुए, मुस्कुराते हुए)
हाँ। और अब कोई डर नहीं है। सब मेहमान आ गए हैं। बेटा… बेटी… कल सगाई होगी जैसे भी हो, नेक काम में किस बात की देरी ?
कला माँ के गले लग जाती है। सेवक सम्मान से सिर झुकाता है। पड़ोसनें एक-दूसरे की ओर देखती रह जाती हैं कुछ में डर, कुछ में अचंभा, कुछ में चुपचाप समर्थन में।
(शेष भाग कल)






