लेखिका/कवयित्री सुश्री सरोज कंसारी नवापारा राजिम रायपुर (छ. ग.)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
आलेख ———–
मन को न उदास करो।
जीवन में कई परिस्थिति आती हैं, जिस पर हमारा नियंत्रण नहीं होता और हम अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। विभिन्न मोड़ पर मन को उदास करने वाले कई कारण हमारे समाने आते हैं। लेकिन हृदय खुशियों से भर जाएं उस पल का निर्माण हमें खुभी करना पड़ता हैं । जिंदगी में कई लोग आते और जाते हैं ,कुछ सीख देकर जाते हैं ,कुछ दर्द और बहुत कम ऐसे होते हैं जो दवा बनते हैं।आज की परिस्थिति में किसी से जुड़ना और उन्हे जीवन भर निभा लेना बहुत कठिन हैं ।क्योंकि समय ही ऐसा हैं दिल से किसी को चाह लेना पर्याप्त नहीं होता ।हर इम्तिहान मनुष्य के मनोबल को या तो बढ़ा देती हैं या कमज़ोर कर देती है ।सहज नही हर रिश्ते को सहेज लेना, उन्हे अपने अनुकूल ढलना या उनके अनुसार हो जाना। सबकी अपनी परेशानी होती है। कुछ मजबूरी में जीते हैं ,कुछ होते हैं जो स्वंत्र विचार धारा के होते हैं।हर पल को आनंदित करने के लिए अपनी मौज के रहना अपने अनुसार करना आज कठिन हैं।
सिर्फ सोच में गुजरती हैं अधिकतर जिंदगी। क्षणिक और नश्वर जिंदगी में बड़ी _बडी ख्वाहिश रखते हैं। जो हैं उस पर वक्त खर्च करने के बजाएं हम भटकते हैं उन चीजों के लिए जिसका वास्तविक जीवन में कोई मोल नहीं। जिसे दिल स्वीकार करें वो लोग और माहौल हमेशा नही मिलते। बल्कि जख्म को कुरेदकर लहुलुहान कर देने वाले से अक्सर सामना होता हैं। फिर यह मान लेना भी जरूरी हैं, सांसारिक सुख और मानसिक खुशी एक साथ नहीं मिलते। यह कैसे संभव हैं एक बार सोचिए! आंतरिक अनुभूति जिससे मन शांत हो उसके लिए त्याग _तपस्या और एकाग्रता चाहिए, दूसरी तरफ बंधे हैं मोह_माया, लोभ, भोग _विलास में तो टकराव स्वाभाविक हैं। यहां अपने निज स्वार्थ के लिए अपनो को नुकसान पहुंचाने से संकोच नही करते, तो गैरो की बात दूर हैं। ज़िम्मेदारी, मान_ मर्यादा आज सिर्फ बात तक सीमित हैं। जब इसे अनुकरण करने की बारी आती हैं तो पहले अपना लाभ ही देखते हैं सभी।
आज लोगो की मानसिकता हर पल विचलित होती हैं।बस स्थिर नहीं हर पल हम संदेह में घिरे होते हैं। अपने हित के लिए किसी को दुखी करना, उन्हें मानसिक तनाव देना आज आम बात हो गई हैं। व्यक्तित्व में निखार के लिए संयम होना, लोगों की भावनाओं को समझना और एक दूसरे का सहयोग जरूरी हैं। मिलकर रहने से कई समस्याएं यूं ही हल हो जाती हैं लेकिन आज हम सिर्फ अपना ही भला चाहते हैं। इसके लिए सीधे सरल सच्चे स्वभाव के लोगो का फायदा उठाते हैं ।इस कारण विश्वास नहीं कर पाते किसी की बातों का, आज कसमें वादें झूठी लगती हैं। अक्सर ठोकर खाकर, धोखा पाकर कभी खुद का मनोबल टूट जाता हैं। इंसान तो हैं टूटकर जुडने में समय लगता हैं।
कभी_ कभी इंसान खुद को तन्हा महसूस करते हैं। मन को बहलाने उसे सांत्वना देने के लिए अतीत में खो जातें हैं, फिर भविष्य के लिए सोचकर काल्पनिक दुनिया में विचरण करने लग जाते हैं। फिर वर्तमान में लौट आते हैं जब मन ही मन बहुत सी अपनी रुचिकर बातें सोचकर खुश हो जाते हैं और फिर अपनी वास्तविक जीवन में लौटते हैं जहां पर अपनो के बीच तन्हा, उलझन और पाते हैं तब उन्हे तब निराशा होती हैं।
इस जमीं से उस आसमां तक जानें के सफर में जन्म और मरण के चक्र से गुजरते हुए, अपने फर्ज और कर्ज चुकाना होता हैं। होनी_ अनहोनी, घटना _दुर्घटना से सदमे _दहशत और भय से भी ग्रसित होते हैं। कर्म प्रधान इस जीवन में अचानक कुछ भी हो जातें हैं ।कोई भरोसा नही न क्या हो फिर भी न जाने क्यों लोग नफरत से भरे होते हैं?कभी_ कभी निष्क्रिय, लापरवाही और मतलबी होने से भी बहुत कुछ खो देते हैं हम।घुटने मत टेकिए !कठिनाइयों को देखकर,बल्कि उसे पार करने की हिम्मत रखिए।
शांत रहकर देखिए दुनिया को अपनी नज़र से और सोचिए! बेवजह शोर करके हम अपनी न जानें कितनी ऊर्जा यूं ही नष्ट कर देते हैं। जहां हमारी बिल्कुल जरूरत नहीं वहां भी सुनने या कहने पहुंच जाते है। अधिकतर मनुष्य के जीवन यहीं परेशानी हैं, जब उनकी जरूरत होती हैं वहां समय पर नहीं पहुंच पाते कोई न कोई बहाना बना ही लेते हैं। और अपनी सोच से कभी _कभी विचित्र हरकत कर मानसिकता को दूषित करते हैं। दुनिया हर व्यक्ति में अच्छी और बुराई होती हैं जानते हैं फिर भी किसी की गलती को गिनाने में कमी नहीं करते। बढ़ _चढ़कर हिस्सा लेते हैं और खुद के बारे में सुनकर बेचैन हो जाते हैं।
सजा पाने से हर किसी को डर लगता हैं। पर बुरे कर्म करते, किसी को चोट पहुंचाने में जरा भी देर नहीं करते। बेवजह भी किसी की जिंदगी में दखल देते हैं मानसिक यातना देते हैं। गलत का अंजाम सही नही होता हर कोई जानते हैं। लेकिन सत्य न्याय, सुरक्षा और विश्व शांति के लिए प्रयास करना जरूरी नहीं समझते। गलत करने पर सजा मिलनी चाहिए चाहें वो कोई भी हो, न मिले तो सोचिए कितनी अव्यवस्था फैल जाएगी हमारे चारों तरफ़। जो बेवजह अपने बुरे स्वाभाव से किसी के जीवन को अशांत करने की कोशिश करे, खुद की गलती को न माने, सिर्फ दोष दे ऐसे लोगों को सबक देना ज़रूरी हैं। कहते हैं दान _दया, धर्म_ धैर्य जीवन में जरूरी है, सही हैं। लेकिन जो सिर्फ तकलीफ देते रहे किसी की मजबूरी को न समझे अत्याचार करते रहें, उन्हें सबक जरूर मिलना चाहिए। अति में सहन करने से भी दुराचारियों की हिम्मत बढ़ती हैं, इसलिए संगठित होकर गलत का विरोध करना भी आवश्यक हैं।
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