राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल उपन्यास (भाग 16)
1977 में उच्चतर माध्यमिक परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होने के बाद राजन का जीवन एक नई दिशा की ओर मुड़ चुका था। डॉ. हरिसिंह विश्वविद्यालय सागर की नियमित कक्षाओं में वह भूगोल, अपराधशास्त्र, मानवशास्त्र, अंग्रेज़ी और हिंदी का अध्ययन करने लगा। किताबों के पन्ने उसके लिए अब मात्र अक्षर नहीं रहे थे, वे जीवन की गहराइयों को समझने के द्वार बन गए थे। कक्षा में वह चुपचाप बैठता, अध्यापक की बातें ध्यान से सुनता और शाम को पुस्तकालय की खिड़की के पास बैठकर नोट्स बनाता और अपने भविष्य का ब्लू प्रिंट तैयार करता है।
उसका जिगरी दोस्त शाहिद भी उसी विश्वविद्यालय में दाखिल हुआ था। अर्थशास्त्र, नागरिकशास्त्र और दर्शनशास्त्र ये विषय लेकर वह आया था, परंतु उसका मन कभी किताबों में नहीं टिका। खेल के मैदान की धूल, व्यायामशाला की भारी वजन वाली लोहे की छड़ें और दोपहर की धूप में भागने का आनंद यही उसके असली गुरु थे। फर्स्ट ईयर की परीक्षा में जब परिणाम आया, तो शाहिद का नाम अनुत्तीर्णों की सूची में था। दोस्तों ने हँसी में कहा, “पढ़ाई और शाहिद दोनों कभी एक साथ नहीं चल सकते,” पर राजन चुप रहा, वह जानता था कि शाहिद की असफलता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक अलग रास्ते की शुरुआत थी।
शाहिद के पिता बचपन में ही चल बसे थे। माँ और तीन बड़े भाई घर का साथ तो था पर आर्थिक सहयोग नहीं था। एक दिन माँ ने बड़े भाई से कहा, “बेटा, शाहिद को किताबों में नहीं, देश की सेवा में भेजो, तीनों भाइयों ने मिलकर फैसला किया। फॉर्म भरे गए, शारीरिक परीक्षा पास हुई और एक दिन शाहिद महार रेजिमेंट सागर से भर्ती होकर वर्दी पहनकर घर लौटा।
दूसरे दिन शाहिद, जो राजन की मां को भी अपनी मां सामान मानता था, उनका आशीर्वाद लेने तिली आया। वह दिन राजन कभी नहीं भूल सका। शाम का सुनहरा प्रकाश तिली की गलियों में फैल रहा था। अचानक घर के बाहर एक सैनिक की छाया पड़ी। वर्दी इतनी चमकदार थी कि धूप भी उससे जलन महसूस कर रही हो। शाहिद मुस्कुराया “राजू, पहचानते हो न? मुझे
राजन की माँ द्वार पर खड़ी थीं, उनकी आँखों में आँसू और गर्व दोनों एक साथ चमक उठे। उन्होंने शाहिद को गले लगा लिया और फिर मुड़कर राजन की ओर देखा। बेटा…” उनकी आवाज में एक अजीब-सी कोमलता थी, “तुम भी नौकरी कर लो। देखो शाहिद को कितना सुंदर लग रहा है वर्दी में। पढ़ाई भी अच्छी है, पर जीवन को एक ठोस आधार भी चाहिए जीने के लिए।
राजन चुपचाप खड़ा रहा। माँ की बात उसके मन में उतरती चली गई और उसने भी विशेष सशस्त्र बल में रेडियो पुलिस का फार्म भरा। शारीरिक परीक्षा पास हुआ दो सप्ताह बाद शाहिद ने कहा भाई, मैं कल मेरे भाई फिरोज ने बताया कि रेडियो पुलिस का रिजल्ट आ चुका है,, आज सुबह मैने आपका फिजिकल एग्जाम निकल गया है। लिखित परीक्षा देने भोपाल चलना है, मैं भी साथ रहूंगा।
वे दोनों रात की बस में बैठे। खिड़की से बाहर अँधेरा भाग रहा था और राजन के मन में एक अजीब-सी हलचल। शाहिद सो गया था, पर राजन जागता रहा। माँ की बात, शाहिद की वर्दी और अपना भविष्य सब कुछ एक साथ घूम रहा था। लिखित परीक्षा हुई और दो महीने बाद अंतिम चयन पत्र आया। राजन का नाम रेडियो पुलिस में निकल आया था। पोस्टिंग पीली कोठी दतिया मध्य प्रदेश में आमद देना है।
उस शाम जब राजन ने माँ को पत्र दिखाया, तो माँ ने कुछ नहीं कहा, उन्होंने केवल उसके सिर पर हाथ फेरा और धीरे से मुस्कुरा दीं। शाहिद दूर फौज में था, पर उसकी उपस्थिति उस पत्र में भी महसूस हो रही थी जैसे दो दोस्तों के अलग-अलग रास्ते एक ही कर्मफल देश की सेवा की ओर सीना तान कर निकल पड़े हैं। राजन समझ गया था जीवन केवल किताबों या वर्दी से नहीं बनता, वह बनता है अनुशासन से, उन निर्णयों से, जो हम अपनी माँ की आँखों में देखकर भारत मां के चरणों में समर्पित करते हैं।
(शेष भाग कल)






