संजय सोंधी (संयुक्त निदेशक) शिक्षा निदेशालय दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
दलीय निष्ठाओं से परे: अमेरिका में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और व्यापक कूटनीति का नया दौर।

वैश्विक राजनीति के बदलते परिदृश्य और अमेरिकी लोकतंत्र के आंतरिक समीकरणों में आ रहे तेज बदलावों के बीच, भारत के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वह अपनी विदेश नीति को किसी एक अमेरिकी दल, प्रशासन या व्यक्ति विशेष की सीमाओं से पूरी तरह मुक्त करे। अमेरिकी राजनीति अब पहले जैसी पूर्वानुमानित नहीं रही है, जहां व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच एक स्थिर वैचारिक सहमति हुआ करती थी। डेमोक्रेटिक या रिपब्लिकन पार्टी की चुनावी जीत-हार अब केवल अमेरिकी घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका असर वैश्विक व्यापार, सुरक्षा गठबंधनों और तकनीकी सहयोग पर भी पड़ता है। ऐसे में, यदि भारत दीर्घकालिक और स्थाई राष्ट्रीय हितों को साधना चाहता है, तो उसे अपनी कूटनीतिक पहुंच को पारंपरिक राजनयिक चैनलों से आगे बढ़ाकर अमेरिकी समाज की गहराई तक ले जाना होगा। किसी एक राजनीतिक दल पर अत्यधिक निर्भरता भारत के रणनीतिक हितों के लिए जोखिम भरी साबित हो सकती है, क्योंकि अमेरिकी सत्ता का केंद्र लगातार बदलता रहता है। अमेरिकी शासन प्रणाली की यह खूबी है कि वहां नीतियों का निर्धारण केवल राष्ट्रपति या कैबिनेट नहीं करती, बल्कि उसमें थिंक टॅंक, नीति निर्माता, उद्योग जगत के हित समूह यानी इंटरेस्ट ग्रुप्स और विभिन्न दबाव समूह यानी प्रेशर ग्रुप्स की निर्णायक भूमिका होती है। वाशिंगटन के इन प्रभावशाली गलियारों में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों खेमों से जुड़े अकादमिक विशेषज्ञों, रणनीतिकारों और कॉरपोरेट दिग्गजों का एक विस्तृत नेटवर्क काम करता है। भारत को अपनी कूटनीति का दायरा बढ़ाते हुए इन दोनों ही दलों के प्रभाव वाले विचार मंचों और नीतिगत समूहों के साथ निरंतर और सक्रिय संवाद बनाए रखना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि भारत को अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दोनों सदनों में द्विदलीय समर्थन को मजबूत करना होगा, ताकि राष्ट्रपति पद पर चाहे जो भी दल का नेता बैठे, भारत-अमेरिका संबंधों की गतिशीलता और द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। रक्षा और सुरक्षा के मोर्चे पर, भारत और अमेरिका के बीच पिछले दो दशकों में जो मजबूत बुनियाद तैयार हुई है, वह केवल नेताओं की व्यक्तिगत केमिस्ट्री पर आधारित नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं की मांग है। चीन के बढ़تے आर्थिक और सैन्य प्रभाव का मुकाबला करने के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक मजबूत साझीदार के रूप में भारत की उपयोगिता को अमेरिकी प्रतिष्ठान के दोनों ही दल भली-भांति समझते हैं। इसके बावजूद, व्यापारिक वार्ताओं, वीजा नीतियों, जलवायु परिवर्तन के मुद्दों और तकनीकी हस्तांतरण जैसे मामलों में अक्सर दोनों देशों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं। इन विसंगतियों से निपटने के लिए यह जरूरी है कि भारत सरकार, भारतीय उद्योग परिसंघ, और देश के प्रमुख रणनीतिक अध्ययन संस्थान अमेरिका के विभिन्न थिंक टैंकों के साथ मिलकर सहयोगात्मक अनुसंधान और संयुक्त नीति निर्माण को बढ़ावा दें। अमेरिकी समाज में विभिन्न समुदायों, विशेषकर भारतीय-अमेरिकी डायस्पोरा की भूमिका भी अब केवल आर्थिक या सांस्कृतिक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि वे वहां की चुनावी राजनीति और नीतिगत बहसों को सीधे प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। भारतीय प्रवासियों को अमेरिकी राजनीतिक दलों के भीतर अपनी पैठ इस प्रकार बनानी चाहिए कि वे भारत विरोधी किसी भी दुष्प्रचार या गलत नीतियों को निष्प्रभावी कर सकें। अमेरिका में ऊर्जा सुरक्षा, सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला, एआई और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे उभरते क्षेत्रों में जो लॉबी सक्रिय हैं, भारत को उनके साथ सीधे संवाद के जरिए अपने तकनीकी और आर्थिक हितों को सुरक्षित करना होगा। जब भारत किसी एक व्यक्ति या विशेष दल के साथ अपने संबंधों को अत्यधिक केंद्रित कर लेता है, तो सत्ता परिवर्तन के समय वहां के नए नेतृत्व के साथ तालमेल बिठाने में अनावश्यक कूटनीतिक ऊर्जा खर्च होती है। इसके विपरीत, एक विकेंद्रीकृत और बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाते हुए भारत को अमेरिकी नीति निर्माण प्रक्रिया के हर स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाहिए। कूटनीति का यह नया दौर इस बात की मांग करता है कि भारत केवल सरकारों के साथ नहीं, बल्कि अमेरिकी समाज की संस्थागत और वैचारिक गहराइयों के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों का विस्तार करे। संक्षेप में कहें तो, बदलती हुई वैश्विक व्यवस्था में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता इसी बात में निहित है कि वह अमेरिकी राजनीति के सभी रंगों और धाराओं के साथ समान रूप से संवाद कायम रखे, ताकि हर परिस्थिति में देश के राष्ट्रीय हित सर्वोच्च बने रहें।







