सावन की छटा और बादलों की घटा के बीच कपनौल घाटी मे नाग देवताओं का होता श्रृंगार।

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ब्यूरो उत्तरकाशी : सुरेश चंद रमोला

सावन की छटा और बादलों की घटा के बीच कपनौल घाटी मे नाग देवताओं का होता श्रृंगार।

ब्रह्मखाल – सावन के महीने में कपनौल घाटी के गांवों में नाग देवता के अलग अलग नामों के रूपों में जो उत्सव मनाया जाता है वह प्रकृति की छटा और बादलों की घटाओं के साथ मन को प्रफुल्लित और उत्साह से भर देता है।

भगवान बौखनाग टिब्बे के तलहटी पर बसा गांव कपनौल की सुंदरता जितनी मनमोहक है उससे अधिक वहां के रीति-रिवाज और तीज त्यौहार है। हर वर्ष सावन के महीने गांव में इष्ट देव बौख नागराजा, ढैश्वर नाग और रूद्रेश्वर नागराज को पालकी में बिठाकर नचाया जाता है। घरों में विशेष पकवान बनाकर उत्सव मनाया जाता है। इस वर्ष भी बौखनाग देवता को थान पर विराजमान कर हर्षोल्लास के साथ मेला मनाया गया। घाटी के ठुलिंका गांव में भी विशाल भंडारे का आयोजन ग्रामीणों द्वारा कराया गया। गांव की विवाहिता महिलाओं द्याणियो ने अपने इष्टदेव ढ्यश्वर नाग को सोने के मूंगों की माला भेंट की और हारूल लगा कर दिन रात मंडाण में उत्साहित रहे। अपना आशीर्वाद देते हुये नाग देवता अगले सावन तक ठोलिंका मंदिर में विराजमान रहेंगे और अगले साल कपनौल को प्रस्थान करेंगे। इससे पूर्व ढैश्वर नाग दारसौ में थे। क्षेत्र के सिमरोल, धारी, बजलाडी व अन्य कई गांवों में भी इस प्रकार मेला इसी प्रकार आयोजित होता है और भाद्रपद की संक्रांति तक रूद्रेश्वर, नागराज सहित क्षेत्र सभी नाग देवता एक वर्ष के लिए अलग गांवों में प्रवास करते हैं। इस क्षेत्र की संस्कृति और अपने इष्टदेव के प्रति ग्रामीणों के मन के भाव देवभूमि की संस्कृति को प्रमाणिकता देते हैं।

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