सुश्री सरोज कंसारी
नवापारा राजिम, रायपुर (छ. ग.)
आलेख
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दुर्गा रूप हैं मां जग कल्याणी, हे! शक्ति दायिनी मात भवानी।
नैनों में समाई तुमने प्रेम की ज्योति,
प्रलय को रोक लेती तुम हो सृजनकारी।
शांति, सौम्यता की देवी शीतला रानी,
मां मुझे विश्राम दें सारे जग की महारानी।।
नवरात्रि में भक्त की भक्ति चरम सीमा पर होती हैं। मातारानी की कृपा प्राप्त करने के लिए पूजन यज्ञ-हवन व भोग-भंडारे की व्यवस्था की जाती हैं। ऐसे लगता हैं समस्त संसार भक्ती के रस में डूबकर अपने जीवन को सार्थक बनाने में जुटे होते हैं। कोई अखंड ज्योत जलाकर पूजा की थाली में रोली- कुमकुम और पुष्प लेकर बड़ी श्रध्दा से मंदिर जाते हैं। आंख बंद कर मातारानी से अपना दुख-दर्द व्यक्त कर एक सुकून भरी सांस लेते हैं। उन्हें लगता हैं माता जगत- जननी है, वो सबकी करुण पुकार सुनती हैं। क्योंकि विश्वास की एक अलौकिक लौ जलती है उनके मन में जिसे मां दुर्गा कभी बुझने नहीं देती। सच हैं- शुद्ध ह्रदय, सकारात्मक सोच, आध्यात्म की राह मनुष्य को कभी भटकने नहीं देती। यही कारण हैं की हिंदू धर्म सत्य- सनातन धर्म हैं जो अपनी परंपरा और धार्मिक स्वभाव के कारण सदा ही श्रेष्ठता को धारण करती हैं।
भगवान भी अवतरित हुए हैं अपने भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर। लोग सांसारिक समस्याओं से व्यथित होकर मन्नते मांगते हैं और पूरी होने पर चढ़ावा देने दूर-दूर तक देवी के धाम जाते हैं। मंदिरो में लंबी कतार लगाकर माता के जयकारे लगाते हैं। कोई बिना चप्पल के चलते है घुटनों के बल, मंदिर की सीढ़ी पार करते हैं। तो भक्ती की शक्ति के बल पर नौ दिन और रात ज्योत जवारा को अपनी छाती में रखते हैं। अपनी क्षमता अनुसार व्रत उपवास भी करते हैं। मनोरम भावपूर्ण दृश्य होता है ।मानो आध्यात्म की गंगा सी बहती हैं। कहीं भजन -किर्तन में मगन जनमानस, भोग- भंडारे में एक पंक्ति में प्रसाद ग्रहण करते मंदिर में एक ही पंडाल के नीचे श्रद्धालु, सुबह-शाम मातारानी की आरती में साक्षात मां दुर्गा अपने नौ रूप से अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। ममता- स्नेह की मूर्ति दयालु माता कभी किसी को निराश नहीं करती।
हर धार्मिक आयोजन का उद्देश्य मानव में सद्व्यवहार का संचार करना, दुर्गुणों का त्याग और जनकल्याण के लिए तत्पर होना होता हैं। कोई भी धर्म आपस में बैर- क्रोध, छल-कपट, लालच अत्याचार, आतंक की सीख नहीं देते। क्योंकी हम जानते हैं मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। किसी भी धर्म के मानने वाले हो सबके अलग तौर-तरीके होते हैं। रास्ते अलग हो सकते हैं लेकीन मंजिल एक ही होती है इंसानियत के गुणों का विकास करना। हृदय की एक हीं आवाज होती हैं सर्वेभवन्तु सुखिन..सभी सुखी हो कोई दुखी न हो रोग-दोष से मुक्त हो के भाव होते हैं।
मां अर्थात ममता की मूरत। पत्थर की मूरत की आराधना से उनमें जान आ जाती हैं, उनकी सच्ची उपासना से हर कष्ट दूर होते हैं। क्योंकि वो जगत माता हैं पालनहार है, जिसकी वंदना और स्तुति से आत्मिक सुख की प्राप्ति होती हैं।
कहते हैं हर घर में देवी होती हैं साक्षात मां बहिन- बेटी और बहू के रूप में। जो करुणा, दया वात्सल्य और स्नेह से पूर्ण होती हैं। अपने कर्तव्य के पथ पर चलकर समर्पित भाव से सबकी सेवा करती हैं। इस दृष्टि से मातृशक्ति पूज्यनीय हैं। जब तक वो सुरक्षित और सुखी नहीं होंगी मंदिर की देवी के लिए आप कोई भी जतन कर ले वो कभी प्रसन्न नहीं होंगी। हम कहते हैं- जहां नारी की पूजा होती हैं, वहां देवता निवास करते हैं। जानते तो सभी है पर मानते कहां हैं ? नारी के विषय वैसे तो बहुत ही सम्मान जनक वचन कहे जाते हैं भाषण बाजी की जाती हैं.. बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ, नारी शक्ति महान है, बेटे-बेटी एक समान, भ्रूण हत्या पाप है, दहेज लेना पाप हैं, कन्यादान महादान, नारी दुर्गा- काली, चंडी- शारदा व लक्ष्मी की अवतार हैं आदि।
महिला दिवस या बालिका दिवस पर विभिन्न आयोजन होते हैं जिसे देखकर मन गदगद हो जाता हैं। उनको विभिन्न क्षेत्रों में शानदार प्रदर्शन के लिए मेडल प्रदान कर अखबार में कवरेज किया जाता हैं। ऐसे लगता हैं जैसे पूरी दुनिया तैनात हो गई मातृशक्ति की सुरक्षा में अब चिंता की कोई बात नहीं। अब वह निर्भय होकर शान से जी सकती हैं। पुरुष शक्ति एकजुट हैं बेटी- बहू और मां को राम-कृष्ण बन बचाने के लिए।
लेकिन इसके दूसरे पहलू को देखकर रूह कांप जाता हैं, पता चलता है यह सब एक आडंबर हैं, षडयंत्र हैं, एक भ्रम हैं।क्योंकी आज भी बीच सड़क में बेटी को घसीटते ले जाकर उन पर अत्याचार किया जाता हैं। भरी भीड़ बचाने की बजाए वीडियो बनाते हैं। और उन्हें वायरल कर वाहवाही लुटती हैं इतना ही नहीं बेटी के पैंतीस टुकड़े कर फेके जा रहे हैं। सामूहिक बलात्कार कर वहसी दरिंदे बेफिक्र घूमते हैं। हद तो तब हो जाती हैं मानवता उस वक्त शर्मशार हो जाती है जब कोई सुराख नहीं मिलते कोई गवाही देने तैयार नहीं होते। अपनी जान बचाने और कानूनी कार्यवाही के डर से भीड़ भाग जाती हैं। सड़क में जंगल में और सुनी राह में बेबस, लाचार और मदद के लिए गुहार लगाती बेटी- बहू और मां को छोड़कर उस वक्त कहां जाते हैं नारी शक्ति जिंदाबाद का नारा लगाने वाले, क्यूं आगे नहीं आते न्याय दिलाने के लिए। बालिका शिक्षा की सीख देने वाले महिला दिवस पर बड़े-बड़े आयोजन कर दिखावटी सम्मान करने वाली संस्था क्यूं उस समय संगठित नहीं हो पाती, जब किसी बेटी की इज्जत से कोई दरिंदे खिलवाड़ करते है ?
मां को हम देवी मानकर पूजते हैं फ़िर वो किसकी मां होती हैं- जो झुकी कमर, कंपकपाती हाथ, झुर्रियों से भरे चेहरे, नम आंखों से बेबस लाचार दुखी होकर सड़को पर भीख मांगती दिखती हैं। आज भी कई घरों में एक कोने में बीमार खांसती, बुखार में तपती सबके होते असहाय जिंदगी, बदत्तर जिंदगी जीने को मजबूर दिखाई देत हैं। दर्द से चूर कराहती हैं, किसी के पास समय नहीं उनके पास जाने का, उनकी सेवा जतन का। जिस मां ने ममता क गोद में पालन- पोषण किया, हर दुख सहकर जीवन समर्पित किया उनके बारे में सोचने के लिए समय नहीं। ये क्यूं भूल जाते हो आप भी कभी बुजुर्ग होगें तब क्या होगा। जब आपसे वही बर्ताव आपके बच्चे करेंगे। भूलना नहीं हर मां में देवी की छवि होती हैं। उनकी सेवा, सत्कार,सम्मान और पूजन के बिना आपके सारे तीर्थधाम बेकार हैं। उस दिन देवी पूजन पूरी तरह सार्थक होंगी जब पूरी दुनिया संगठित होकर रक्षा कवच तैयार कर लेंगी मातृशक्ति की सुरक्षा के लिए। तब जीत होगी हर बेटी- बहू, बहिन और मां की।कोई रावण पार न कर पाएगा दहलीज सीता हरण के लिए तब सही अर्थ में मां की पूजा हो पाएंगी।
मोहनी हैं मूरतिया लगती हो प्यारी,
आश और विश्वास तुम्ही हो नारायणी।
मंगलमयी हो शुभकर्ता तुम ही वैष्णवी,
सर्वसुख दात्री शिवप्रिये तारणहारी।।
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