एक अंधा आदमी.

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राजकुमार कुम्भज

जवाहरमार्ग, इन्दौर

 

           (नया अध्याय, देहरादून)

 

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 एक अंधा आदमी.

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वक्त ऐसा भी आता है जीवन में 

          जब खोने को कुछ भी होता नहीं है पास

             न रिश्ते, न संगति, न प्रार्थना, न पैसा

             वक्त तो पहले ही खो चुका होता हूँ मैं 

            अभी जिसमें चल रहा हूँ कि जल रहा हूँ 

            जानता ही नहीं हूँ कुछ भी कि ये है क्या 

              अनजान नहीं हूँ, लेकिन जो हो रहा है 

               वह सब पहले कभी देखा-सुना नहीं 

              ये जो हो रहा है चलने और जलने जैसा 

              कोई खास वजह नहीं है नजर इसकी

             एक बस्ती है और बड़ी भीड़ है सड़कों पर 

             यातायात की अराजकता में फँसी हुई 

             जिसे संभालने की जिम्मेदारी के स्वाँग में 

                 बहुत बड़ा होता जा रहा है यहीं-कहीं 

                      एक अंधा आदमी.

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एक अलग-सी आग.

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अजीब-सी अकुलाहट 

और एक अलग-सी आग है भीतर 

जो न तो खत्म होती है कभी, कहीं

और न कहीं भस्म ही करती है मुझे 

सुलगती रहती है, धधकती रहती है 

जानता हूँ कि एक दिन आएगी आँधी

और सब कुछ उड़ा ले जाएगी अपने साथ 

आँखें होते हुए भी देख नहीं पाऊँगा मैं 

इस लौ का बुझना, जो अकुलाहट भरी

धधकती रही है निरंतर, निरंकुश अभी 

मेरे खुद के भीतर.

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 कमाल यही था.

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  कल जब मेरा वक्त था 

               तो सचमुच मेरे पास वक्त नहीं था 

              और आज जब मेरे पास वक्त है 

               तो सचमुच मे‌रा वक्त नहीं है

                     कल मैं अंधा था,

                     घर में दर्पण था 

                   आज मैं अंधा नहीं हूँ,

                    घर में दर्पण नहीं है

                    एक मुसीबत था,

                     एक जरूरत है 

               मुसीबत और जरूरत में 

              बेहद ही महीन-सा फर्क था 

               मैं था, वक्त था, दर्पण था.

                      कमाल यही था.

                 ____________________

 

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