स्वच्छ सिंहस्थ के लिए पर्यावरण प्रदूषण व स्थानीय तापमान पर चिंतन की आवश्यकता।

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प्रहलाद शर्मा

 

                 (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

स्वच्छ सिंहस्थ के लिए पर्यावरण प्रदूषण व स्थानीय तापमान पर चिंतन की आवश्यकता।

 

 

 

उज्जैन में आयोजित होने वाले महाकुंभ को मध्यप्रदेश सरकार विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन मानते हुए तैयारी में जुटी हुई है। 27 मार्च से 27 मई 2028 तक 60 दिनों तक चलने वाले इस आस्था के महाकुंभ में लगभग 40 करोड़ श्रद्धालुओं के आने का अनुमान लगाया जा रहा है। सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष में 3060 करोड़ का बजट प्रावधान किया है, वहीं 13851 करोड़ के विकास कार्यों की घोषणाएं भी की है। समूचे उज्जैन जिले में इस भव्य आयोजन को लेकर युद्ध स्तर पर निर्माण और विकास कार्य चल रहे हैं। इन सबके बीच इस आयोजन में एक महत्वपूर्ण विषय है पर्यावरण प्रदूषण और स्थानीय तापमान में होने वाली वृद्धि। सरकार को इस दिशा में चिंतन करते हुए ठोस कदम उठाए जाने पर गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है। आज हम इसी विषय पर कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को लेकर सरकार का ध्यान केंद्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। यह महाकुंभ हरिद्वार, प्रयागराज और नासिक से ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। जिसके एक नहीं अनेक कारण हैं, हम उस पर भी विस्तृत प्रकाश डालते हुए भावी खतरे से सरकार को आगाह करते हुए उसके समाधान हेतु समय रहते उचित कदम उठाने का सुझाव भी प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश सरकार उज्जैन महाकुंभ का आयोजन लगभग 3360 हेक्टेयर के विशाल क्षेत्रफल में आयोजित करने की तैयारी कर रही है। जिसमें एक स्थायी कुंभ सिटी के साथ ही आस्था की डुबकी लगाने के लिए क्षिप्रा नदी पर 29 किमी लंबे घाट तैयार किए जा रहे हैं। सरकार इस आयोजन को स्वच्छ सिंहस्थ के माध्यम से कार्बन क्रेडिट अर्जित करने की योजना भी बना रही है। जिसके तहत कुंभ क्षेत्र में प्लास्टिक की रिसाइक्लिंग और न्यूनतम अपशिष्ट उत्पादन, कचरे को संसाधन में बदलने की आधुनिक तकनीक का उपयोग के साथ ही कुंभ क्षेत्र और आस-पास के इलाकों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण की योजना भी है। बेशक स्वच्छता की दृष्टि से यह सरकार का एक अच्छा प्रयास माना जा सकता है। लेकिन क्या इतने भर से इस महाकुंभ में उत्पन्न होने पर्यावरण प्रदूषण को रोका जा सकता है? क्या कचरे का निष्पादन और प्लास्टिक की रिसाइक्लिंग जैसे कार्य से इतनी बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं और उनके वाहनों, उनके लिए तैयार किए जाने वाले भोजन तथा उस क्षेत्र में की जाने वाली विद्युत आपूर्ति से उत्सर्जित होने वाली कार्बन-डाई-ऑक्साइड अर्थात कार्बन से स्थानीय तापमान में वृद्धि नहीं होगी? क्या यह पर्यावरण प्रदूषण का एक बड़ा और गंभीर कारक नहीं होंगे? हां सरकार द्वारा कुंभ क्षेत्र और आस-पास के इलाकों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण की योजना जरुर बनाई गई है लेकिन क्या अल्प समय में इतनी बड़ी तादाद में वृक्षारोपण कार्य किया जा सकता है और इतने पौधे एक साथ तैयार हो सकते हैं? सरकार को स्थानीय तापमान नियंत्रित करने, पर्यावरण संरक्षण करने तथा निरंतर लंबे समय तक कार्बन क्रेडिट का लाभ अर्जित करने के साथ ही आध्यात्मिक परंपरा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में विश्व पटल पर एक सकारात्मक परिणाम मूलक संदेश देने हेतु वृक्षारोपण कार्य को अविलंब प्रारंभ करना चाहिए।

 

हरिद्वार, प्रयागराज और नासिक से ज्यादा उज्जैन चुनौतीपूर्ण क्यों?

इन तीन स्थानों की तुलना में उज्जैन का कुंभ अधिक चुनौतीपूर्ण क्यों है इसका तुलनात्मक अध्ययन करते हैं।

– हरिद्वार कुंभ का आयोजन अप्रैल माह में एक माह के लिए होता है। उस समय वहां का तापमान 18 से 35 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। वहीं हरिद्वार जिले में लगभग 583.94 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र है। यह जिला अपने महत्वपूर्ण वनों के लिए तथा यहां स्थित राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के लिए भी जाना जाता है।

– प्रयागराज कुंभ जनवरी फरवरी माह में आयोजित होता है। यह पूरी तरह ठंड का मौसम होता है। यहां पर्यावरण संरक्षण और शुद्ध वायु के लिए शहर में ही 56 हजार वर्गमीटर क्षेत्र में घने वन विकसित किए गए हैं।

– नासिक कुंभ अगस्त सितंबर माह में आयोजित होने वाला है। यह मूल रूप से बरसात का समय रहता है और इस दौरान यहां का तापमान 21 से 28 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। इस क्षेत्र में लगभग 3400 वर्ग किलोमीटर से अधिक वन क्षेत्र है।

– उज्जैन कुंभ अप्रैल व मई माह में आयोजित होगा। इस दौरान उज्जैन जिले का तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस सामान्य तौर पर दर्ज किया जाता है। वहीं इस जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्र में मात्र 0.59 प्रतिशत अर्थात कोई भी वन क्षेत्र नहीं है। जिससे शुद्ध वायु मिल सके और यहां इतनी बड़ी तादाद में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए शुद्ध आक्सीजन की व्यवस्था हो सकें। बल्कि यहां सामान्य तौर पर रहने वाला तापमान इतनी बड़ी तादाद में आने वाले श्रद्धालुओं और उनके वाहनों, उनके लिए खाने-पीने की व्यवस्था तथा इतने बड़े क्षेत्र की विद्युत आपूर्ति से उत्पन्न कार्बन डाइ ऑक्साइड को अवशोषित करने की कोई अस्थाई व्यवस्था नहीं है।

 

 महज चार घटकों से ही उत्पन्न होगा लाखों टन कार्बन

 

कुंभ क्षेत्र में वैसे तो कार्बन उत्सर्जन करने के अनेक घटक रहेंगे। लेकिन हम यहां केवल चार महत्वपूर्ण घटकों पर ही चर्चा कर रहे हैं। जिन्हें सरकार को वर्तमान कार्य योजना में गंभीरता से शामिल करना चाहिए। उज्जैन कुंभ नगरी 2378 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित की जा रही है। यहां सरकार द्वारा 60 दिनों में लगभग 30 से 40 करोड़ श्रद्धालुओं के आने की संभावना जताई जा रही है। इतनी बड़ी व्यवस्था को संचालित करने के लिए लगने वाली सरकारी मशीनरी, समाजसेवी संस्थाओं और दलों आदि को छोड़कर हम केवल आगंतुक श्रद्धालुओं को ही दृष्टिगत रखते हुए बात करते हैं।

– सरकारी संभावना के अनुसार प्रति दिन औसतन 50 लाख श्रद्धालु यहां आएंगे। भारतीय वार्षिक मानक अनुसार केवल स्वांस लेने छोड़ने में ही इन 60 दिनों में यह श्रद्धालु 6.50 लाख टन कार्बन उत्सर्जन करेंगे।

– औसतन 50 लाख श्रद्धालु के लिए प्रतिदिन शाकाहारी भोजन तैयार करने पर भारतीय मानक प्रति व्यक्ति प्रति दिन भोजन तैयार करने पर न्यूनतम 700 ग्राम कार्बन उत्सर्जन होता है तो 60 दिनों में 1 लाख 50 हजार टन कार्बन उत्सर्जन होगा।

– इन श्रद्धालुओं के आने पर उनके यात्री वाहनों से महज 30 किमी दूरी तय करने पर तय मानक अनुसार प्रति किमी 130 ग्राम के मानक से 3600 टन प्रति दिन और 60 दिनों में 2.19 लाख टन कार्बन उत्सर्जन होगा।

– अगर हम प्रयागराज कुंभ की बिजली खपत को ही आधार मानकर गणना करें तो वहां 3.20 करोड़ यूनिट बिजली खपत हुई थी, जिससे 26240 टन कार्बन उत्सर्जन हुआ था। जबकि सिंहस्थ में उसकी तुलना में अधिक बिजली खपत होने का अनुमान है।

 

 कैसे होगा इस लाखों टन कार्बन का अवशोषण

 

सिंहस्थ मेले के दौरान उत्सर्जित कार्बन का अवशोषण कैसे होगा? क्या इससे लोकल वार्मिंग का खतरा पैदा नहीं होगा? इस सबका समाधान तथा श्रद्वालुओं के साथ ही स्थानीय लोगों की स्वास्थ्य रक्षा हेतु महत्वपूर्ण है अधिक से अधिक वृक्षारोपण कार्य को अभी से धरातल पर उतारने की। अंतरराष्ट्रीय मानक अनुसार एक युवा पेड़ प्रति वर्ष औसतन 20 – 25 किलो कार्बन अवशोषण करता है। लेकिन सरकार द्वारा अगर अभी से वृक्षारोपण कार्य योजना को मूर्तरुप दिया जाता है तो सिंहस्थ के समय में यह पौधे शिशु अवस्था में ही सही प्रति पौधे 5 से 10 किलो कार्बन अवशोषण करने में सक्षम हो जाएंगे। इतना ही नहीं बल्कि यह पौधे आने वाले 20-25 वर्षों तक या जब तक काटे नहीं जाएंगे, कार्बन क्रेडिट का निरंतर प्रति वर्ष करोड़ों रुपए की आय प्रदान करते रहेंगे। जिस तरह सरकार स्थायी रुप से सिंहस्थ सिटी विकसित कर रही है उसी तरह यह पौधे भी भविष्य के लिए उज्जैन जिले तथा 2028 में होने वाले सिंहस्थ में प्राकृतिक आक्सीजन प्लांट बनकर खड़े होंगे। वहीं वर्तमान में सरकार के मुखिया डॉ मोहन यादव राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस कुंभ के माध्यम से ग्लोबल वार्मिंग की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश प्रदान करने में कामयाब होंगे। आवश्यकता है त्वरित निर्णय और ईमानदारी से योजना को जमीनी धरातल पर उतारने की ताकि यह कुंभ आस्था के साथ प्रकृति और पीढ़ियों के संरक्षण का संदेशवाहक बनकर उभरे। (विनायक फीचर्स)

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