ब्यूरो गोंडा (उ. प्र.): सियाराम पांडेय
(नया अध्याय, देहरादून)
क्षेत्र के नगवा में गौसिया चिश्तिया मेला, कव्वाली की सूफियाना महफिल के साथ हुआ शानदार समापन।
नगवा की फिजाओं में बीती रात सूफियाना रंग घुल गए, जब हजरत हाजी मलंग शाह बाबा का 36वां सालाना उर्स और हजरत बाबा समसुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह की पाक याद में आयोजित दो दिवसीय गौसिया चिश्तिया मेला कव्वालियों की गूंज के साथ मुकम्मल हुआ। देर रात तक चली इस रूहानी महफिल ने अकीदतमंदों के दिलों को सुकून और इश्क-ए-इलाही से भर दिया। पूरे इलाके में मेले के समापन की चर्चा रही और जायरीनों ने इसे नगवा की साझा तहजीब का एक और खूबसूरत उदाहरण बताया।
रूहानियत से सराबोर हुआ आगाज
कार्यक्रम की शुरुआत शाम मगरिब की नमाज के बाद कुरान-ख्वानी और फातिहा से हुई। इसके बाद दिल्ली से पधारे मशहूर रेडियो सिंगर और कव्वाल साकिब साबरी व इंतजार साबरी ने माइक संभाला तो पूरी महफिल में एक अलग ही नूर बिखर गया। साकिब साबरी ने अपने मखसूस अंदाज में जब पेश किया, _“यूँ तो आए हैं लाखों पैगंबर, मेरे सरकार सा कोई आया नहीं”_, तो पूरा पंडाल ‘सुभान अल्लाह’ और ‘वाह-वाह’ की सदाओं से गूंज उठा। उनकी आवाज में पैगंबर-ए-इस्लाम के लिए मोहब्बत और अकीदत का जो जज़्बा था, उसने हर उम्र के लोगों को अपने से जोड़ लिया।
इसके बाद इंतजार साबरी ने ख्वाजा गरीब नवाज की शान में कलाम पढ़ा— _“मेरी आंखों ने देखा है ऐसा सनम, अब किसी भी सनम की जरूरत नहीं। मेरे ख्वाजा ने ऐसा करम कर दिया, अब किसी के करम की जरूरत नहीं।”_ इस कलाम पर अकीदतमंद झूम उठे। कई बुजुर्गों की आंखें नम हो गईं। कव्वाली के दौरान ‘हक मलंग’ और ‘या ख्वाजा’ के नारों ने माहौल को और रूहानी बना दिया। दोनों कव्वालों ने लगभग तीन घंटे तक एक से बढ़कर एक कलाम पेश किए, जिनमें ‘भर दो झोली मेरी या मोहम्मद’ और ‘छाप तिलक सब छीनी रे’ जैसे सूफियाना कलाम भी शामिल रहे।
कार्यक्रम का संचालन साकिर अली ने बेहद सधे हुए अंदाज में किया। उन्होंने हर कलाम से पहले उसका मफ़हूम समझाया, जिससे नौजवानों को भी सूफी परंपरा की गहराई समझने में मदद मिली। साकिर अली ने मंच से बार-बार गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे का पैगाम दिया।
दो दिन चला आस्था और संस्कृति का संगम
गौसिया चिश्तिया मेला सिर्फ कव्वाली की महफिल तक सीमित नहीं था। दो दिनों तक चले इस आयोजन में दिन के समय लंगर-ए-आम का एहतमाम किया गया, जिसमें मजहब-मिल्लत से ऊपर उठकर सभी ने एक साथ बैठकर खाना खाया। दूर-दराज से आए जायरीनों के लिए ठहरने और वुजू-वजाइफ का भी इंतजाम किया गया था। बच्चों के लिए छोटे झूले और खान-पान की दुकानें भी मेले का हिस्सा रहीं, जिससे पूरा माहौल एक पारंपरिक मेले जैसा लगा।
स्थानीय बुजुर्गों ने बताया कि हजरत हाजी मलंग शाह बाबा की दरगाह से लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है। हर साल उर्स पर मन्नतें पूरी होने पर लोग यहां चादरपोशी और नज़राने पेश करने आते हैं। 36 साल से लगातार यह उर्स इसी अकीदत के साथ मनाया जा रहा है और हर साल इसका दायरा बढ़ता जा रहा है।
आयोजन को सफल बनाने में जुटी रही टीम
सालाना उर्स को कामयाब बनाने के लिए आयोजन समिति के लोग पिछले एक महीने से तैयारियों में जुटे थे। शहाबुद्दीन, मोहम्मद अहमद और मोहम्मद मोबीन ने मेहमानों के ठहरने और लंगर की जिम्मेदारी संभाली। वहीं रजब अली और सहबान ने पूरे मेला परिसर की साफ-सफाई और सुरक्षा व्यवस्था देखी। बाबा अब्दुल अजीज व नूरुद्दीन कादरी चिश्ती ने दरगाह पर रात भर चली रस्मों को मुकम्मल कराया। इन सभी के अलावा दर्जनों नौजवान वालंटियर के तौर पर सेवा में लगे रहे, जिन्होंने आने वाले जायरीनों को रास्ता दिखाने से लेकर पानी पिलाने तक का काम किया।
हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बना मेला
कार्यक्रम की सबसे खास बात यह रही कि इसमें सभी धर्मों के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जिला पंचायत सदस्य प्रत्याशी विवेक सिंह, ग्राम प्रधान स्वामीनाथ सिंह, चेतपुर प्रधान अशोक सिंह के साथ मोहम्मद यूनुस, नियाज खान और अलाउद्दीन एक साथ पहली सफ में बैठे नजर आए। देवता प्रसाद पांडे, वासुदेव और ओम सिंह जैसे स्थानीय वरिष्ठ लोगों ने भी देर रात तक कव्वाली सुनी और आयोजन की तारीफ की।
ग्राम प्रधान स्वामीनाथ सिंह ने कहा, “यह उर्स हमारे गांव की पहचान है। यहां हिंदू-मुस्लिम का फर्क मिट जाता है। मलंग बाबा के दर से कोई खाली नहीं जाता।” वहीं जिला पंचायत सदस्य प्रत्याशी विवेक सिंह ने आयोजन समिति को बधाई देते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम सामाजिक समरसता को मजबूत करते हैं।
सुबह कुल की रस्म के साथ हुआ समापन
देर रात 2 बजे के बाद कव्वाली महफिल के समापन पर सलातो-सलाम पढ़ा गया। सुबह फज्र की नमाज के बाद ‘कुल की रस्म’ अदा की गई और मुल्क में अमन-चैन, आपसी मोहब्बत और खुशहाली की दुआ मांगी गई। दुआ के बाद शीरनी तकसीम की गई। इसके साथ ही दो दिवसीय गौसिया चिश्तिया मेले का पाकीजा माहौल में समापन हो गया।
विदा लेते वक्त जायरीनों के चेहरे पर सुकून और अगले साल फिर आने का वादा था। नगवा के इस उर्स ने एक बार फिर साबित किया कि सूफी परंपरा आज भी लोगों को मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे के एक धागे में पिरोने की ताकत रखती है। आयोजकों ने सभी सहयोगियों, ग्रामवासियों और प्रशासन का शुक्रिया अदा किया, जिनकी मदद से 36वां सालाना उर्स खैर-खैरियत से मुकम्मल हुआ।







