डॉ0 हरि नाथ मिश्र, अयोध्या
(नया अध्याय, देहरादून)
दोहे (भीमराव)
भीमराव-शुचि सोच ने, दी सब आँखें खोल।
रहा पुराना रोग जो, खोली उसकी पोल।।
ऊँच-नीच के भाव का, अंतर दिए बताय।
नवल चेतना-सोच का, दीपक दिए जलाय।।
मानव-मानव-भेद तो, अनुचित मानव-सोच।
अब सब ऐसे भाव को, तज दें निःसंकोच।।
विधिक-चेत अंबेडकर, निश्चित व्यक्ति महान।
श्रद्धा-सुमन चढ़ा इन्हें, करे जगत सम्मान।।
संविधान निर्मित किए, इनका है आभार।
इसी विधिक कानून से, चले आज सरकार।।
अखिल विश्व में देश की, विधि का हो यश-गान।
संविधान रच राव ने, दे दी सोच महान।।
शोषक-शोषित मध्य की, मिटती दिखे दरार।
धन्य-धन्य वह सोच है, उसका है आभार।।






