बेटी ईश्वर का दिया वह अनमोल उपहार है!

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका

अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति

गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, छ.ग

 

                (नया अध्याय, देहरादून)

 

आलेख:

बेटी ईश्वर का दिया वह अनमोल उपहार है!

– सुश्री सरोज कंसारी

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जो घर को आँगन से लेकर मन तक महका देती है। उसकी किलकारी में सृजन है, उसकी हँसी में परिवार की समृद्धि है और उसके सपनों में देश का भविष्य है। जब हम बेटी को बोझ समझकर दहेज के तराजू पर तौलते हैं, तब हम सिर्फ एक पिता का दिल नहीं तोड़ते, बल्कि समाज की नींव में दरार डाल देते हैं। शिक्षा, समानता और आत्मनिर्भरता के इस दौर में भी अगर बेटी की कीमत दहेज से आँकी जाए, तो हमारी सारी प्रगति अधूरी है…बेटी तो है बाबुल के दिल का टुकड़ा, दहेज कहाँ इससे बड़ा? दिल में पत्थर रख करता पिता कन्यादान।

जिगर के टुकड़े को चौखट से विदा करना,  

    पिता के लिए सबसे कठिन होता काम।  

    दिल में पत्थर रखकर करता कन्यादान,  

    सब दानों से बढ़कर होता यह महादान।।

 

आज शिक्षा के क्षेत्र में हम निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। ‘बेटे-बेटी में कोई फर्क नहीं’ के नारे अब केवल दीवारों पर नहीं, दिलों में भी उतर रहे हैं। जागरूकता के कारण बेटियाँ घर की चारदीवारी से निकलकर अपने हौसलों को नई उड़ान दे रही हैं। पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बनी हैं और अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल भी हुई हैं। पर आज भी समाज में कहीं-न-कहीं सुनने को मिल ही जाता है – “ज्यादा पढ़कर क्या करेगी? चूल्हा-चौका तो करना ही है”, “बेटी पराई है”, “उम्र हो गई तो विवाह कौन करेगा?”। ऐसी बातें आज भी कोमल भावनाओं को गहरी चोट पहुँचाती हैं।

 

बेटी जैसे ही विवाह योग्य होती है, पिता के माथे पर चिंता की लकीरें गहरा जाती हैं। हर पिता चाहता है कि उसकी बेटी का विवाह अच्छे संस्कारी घर में हो। लेकिन कुछ लोगों की रूढ़िवादी सोच और लालच की प्रवृत्ति के कारण आज भी कई बेटियाँ मानसिक रूप से प्रताड़ित होती हैं। चाहे वे कितनी भी पढ़ी-लिखी क्यों न हों, बेवजह के तानों से उनका मन विचलित रहता है। कहते हैं जमाना बदल रहा है, बिल्कुल ठीक है, पर आज भी न जाने कितनी बेटियाँ दहेज की बलिवेदी पर चढ़ जाती हैं। बेटी के विवाह के बाद कर्ज के बोझ तले दबकर पूरा परिवार जीवन भर संघर्ष करता रहता है।

 

दहेज मूलतः उपहार देने की एक परंपरा थी जिसे पिता अपनी बेटी को प्रेमस्वरूप भेंट के रूप में देते थे। यह भेंट बेटी की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होती थी, जिसमें कोई माँग नहीं होती थी। पिता अपनी क्षमता और स्तर के अनुसार स्वेच्छा से देता था। लेकिन उपहार की यह पवित्र प्रथा धीरे-धीरे दहेज रूपी भयंकर राक्षस का रूप लेती गई। यह उपहार न रहकर बेटियों के लिए अभिशाप साबित हुआ।

 

दहेज माँगकर भिखारी होने का सबूत देने वाले हर उस पिता को धिक्कार है जो अपने बेटे के पालन-पोषण, शिक्षा और नौकरी का खर्च वधू पक्ष से वसूल करते हैं, वह भी सक्षम होते हुए। जब कोई भिखारी आपके दरवाजे पर आता है तो आप कुछ रुपये दान देने के बजाय खरी-खोटी सुनाकर कहते हैं, “शर्म नहीं आती भीख माँगते हुए? नौजवान हो, मेहनत करो” और उसे दुत्कार कर भगा देते हो। जरा शांत दिमाग से सोचिए! एक मजबूर पिता से उसके कलेजे का टुकड़ा लेने के बाद भीख के रूप में दहेज लेते हो। उस वक्त यदि वधू आपसे वही बात कहे, आपको भिखारी समझकर विवाह से इंकार कर दे, तब आपकी क्या स्थिति होगी? दहेज को अभिशाप बताने वाले इस सभ्य समाज से एक प्रश्न है – यदि सभी दहेज के खिलाफ हैं, तो ये लेन-देन का व्यापार करता कौन है? क्यों हर पल हजारों बेटियाँ आज भी दहेज की बलिवेदी पर चढ़ती हैं? प्रताड़ित होती हैं, जहर खा लेती हैं, आजीवन ताने सुनती हैं, कैद बनकर जीवन गुजारती हैं, रोती-बिलखती हैं। आज भी मंडप से बारात लौट जाती है और उसे सुंदरता के तराजू में तौला जाता है?

 

चलिए, दहेज के लालची और कठोर हृदय वाले हर व्यक्ति के लिए समाज में बनी इस परंपरा को पलटकर देखते हैं। अपनी बेटी की जगह अब बेटे की बिदाई करें। दहेज की माँग करने का अधिकार वधू पक्ष को मिले और एक बेटा दामाद के रूप में ससुराल में रहकर हर वो नियम निभाए जो एक बहू अपने ससुराल में निभाती है। पत्नी के परिवार की पूरी जिम्मेदारी ले, तब महसूस होगा कि कैसे दिल पर पत्थर रखकर अनजान लोगों को अपनाती है एक बेटी, बहू बनकर। उस दिन आपको पता चलेगा कि बेटी होने का दर्द क्या होता है। कभी मजबूर पिता की जगह पर खड़े होकर तो देखिए, पता चलेगा कि कितना गमगीन होता है उनका जीवन एक बेटी को दुखी और प्रताड़ित होते देखकर।

 

दहेज हर रूप में एक घटिया और अमानवीय कृत्य है। किसी भी रूप में दहेज न लें और एक आदर्श पिता होने का परिचय दें। बेटी अपने आप में अमूल्य धन है। उसे मजबूर, बेबस, लाचार और क्रोधी होने के लिए विवश न करें। वह प्रलय और सृजन दोनों की देवी है, उसे सम्मान दें। बेटी को पर्याप्त शिक्षा देकर आत्मनिर्भर बनाइए, ताकि उसे किसी पर बोझ न होना पड़े। बेटे को मेहनत और स्वाभिमान का पाठ पढ़ाइए ताकि उसे मजबूर पिता से दहेज लेने का लालच न हो। बेटी किसी की भी हो, वह सारे संसार की शान है, मर्यादा है, एक जिम्मेदारी है। सिर्फ बातों में दहेज विरोधी नारे न रह जाएँ। हर बेटी के पिता और बेटे के परिवार को संकल्प लेना ही होगा कि बिना दहेज के विवाह कर एक मिसाल प्रस्तुत करें। दिखावे के लिए औकात से ज्यादा खर्च न हो। सादगीपूर्ण विवाह कर एक सुंदर और सुखद समाज के निर्माण में अपना योगदान दें।

होते हैं नादान जो करते दहेज की माँग,  

  पिता के लिए तो बेटी होती है वरदान।  

  बचपन से यौवन तक की दहलीज तक,  

  संजोये होते हैं न जाने कितने अरमान।।

 

बदलाव हमेशा एक घर, एक सोच से शुरू होता है। अगर आज हर पिता अपनी बेटी को दहेज नहीं बल्कि डिग्री और हिम्मत देकर विदा करे, और हर सास-ससुर बहू को बेटी का दर्जा दें, तो कल का समाज दहेज-मुक्त होगा। बेटी का मान ही परिवार का सम्मान है। आइए, हम सब मिलकर शपथ लें कि न दहेज लेंगे, न दहेज देंगे, क्योंकि बाबुल के दिल के टुकड़े की कोई कीमत नहीं होती। वही सबसे बड़ा धन है, सबसे बड़ा दान है।

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