सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका
अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, छ.ग.
नया अध्याय, देहरादून
“सीता से चंडी तक!”
(कविता)
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नारी के वजूद पर उठते हैं कई सवाल,
अनंत वेदनाओं का कोई रखे न खयाल।
हर युग में हुआ उस पर अत्याचार,
पर सहनशीलता, संयम उसका बेमिसाल।
सभ्य चेहरे लिए घूमते कई रावण यहाँ,
हर दिन होता हरण बेगुनाह सीता का।
पूर्ण सुरक्षा का बना न अब तक ढाल,
हर पुरुष को कहाँ मर्यादा का भान?
काश! हर घर में हो कौशल्या-सी माता,
जो पढ़ा पाए नारी-सम्मान का पाठ।
रघुकुल सी नहीं हैं यहाँ रीति-रिवाज,
विश्व पटल से उठती क्यों नहीं आवाज?
नारी के प्रति अब बदलो नजरिया,
वो नहीं है मोम की इक गुड़िया।
सती-सावित्री सी, कभी अहिल्या बन जाए,
काली, दुर्गा, चंडी बनकर रूप दिखाए।
दुष्ट-पापी राक्षसों का करे सर्वनाश,
देहरी लाँघते ही रच दे नया इतिहास।
हर क्षेत्र में कुशलता से करती काम,
दीन-दुखी, प्रताड़ित अब न लाचार।
आत्मनिर्भर बन बढ़ा रही देश का मान,
फिर भी सूनी राहों में हवस की शिकार।
क्यों खत्म नहीं होता दहशत का माहौल,
क्यों हवस की दरिंदगी से होती उसकी हार?







