राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
उसलापुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मौसम ( कविता)
धरा का अंग-अंग अब तप रहा
समय का चक्र, कैसा छप रहा
असमय बादलों की घोर गर्जना
तप्त धूप का है, प्रलय बरसना
नदियाँ अपनी, राह अब भूल गई
बर्फ की चोटियाँ भी, पिघलने लगी
वसंत की आहट का, पता नहीं चलता
शीत का साया, ठीक से नहीं पलता
ऋतुओं का, निश्चित क्रम बदल गया
प्रकृति में जो एक संयम टल गया
वह अनुशासन अब बिखरने लगा
इंसान का स्वार्थ अब उभरने लगा
हवाओं में घुली, जहर की मिठास है,
पक्षी ढूंढते अपना, आश्रय-आवास हैं।
पेड़ जो देते थे, शीतल छाँव पुरानी,
आज खुद जूझ रहे हैं, पीने को पानी
यह समय की चेतावनी है, समझ जाओ
अपनी भूलों का तुम प्रायश्चित कर आओ
अभी भी समय है, धरा को सँवार लें यारों
नई पीढ़ी को, सुंदर सा उपहार दो यारों
पर्यावरण दिवस की शुभ -कामनाएं







