श्री जगन्नाथ महाप्रभु की भव्य रथ यात्रा-आस्था, इतिहास और अनूठे रथों का अलौकिक उत्सव।

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संजय सोंधी 

(संयुक्त निदेशक) 

शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार

 

 

 

                  (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

    16 जुलाई 2026 को रथ यात्रा उत्सव की शुरुआत 

 

 

श्री जगन्नाथ महाप्रभु की भव्य रथ यात्रा-आस्था, इतिहास और अनूठे रथों का अलौकिक उत्सव।

 

 

ओडिशा के पावन क्षेत्र पुरी में स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में गंग राजवंश के प्रतापी राजा चोडगंग देव ने शुरू करवाया था, जिसे बाद में राजा अनंगभीम देव ने पूर्ण रूप दिया। ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस भव्य मंदिर में रथ यात्रा का यह दिव्य पर्व राजा इंद्रद्युम्न के काल से ही, यानी लगभग मंदिर की स्थापना के समय से ही निरंतर चला आ रहा है। जो सदियों से भारतीय संस्कृति की धरोहर रही हैं।

इस महाउत्सव का सबसे मुख्य आकर्षण महाप्रभु, उनके बड़े भाई और बहन के तीन विशाल रथ होते हैं। ये रथ किसी धातु के नहीं, बल्कि पूरी तरह से पवित्र नीम के पेड़ों की लकड़ियों से निर्मित होते हैं, जिन्हें ‘दारु’ कहा जाता है। इन रथों के निर्माण में एक भी लोहे की कील का उपयोग नहीं किया जाता, जो प्राचीन भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ उदाहरण है। भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम ‘नंदीघोष’ है, जिसकी ऊंचाई 45 फीट होती है। इसमें 16 पहिये लगे होते हैं और इसे पीले व लाल रंग के कपड़ों से सजाया जाता है। बड़े भाई भगवान बलभद्र के रथ को ‘तालध्वज’ कहा जाता है, जिसकी ऊंचाई 44 फीट होती है। इस रथ में 14 पहिये होते हैं और इसे नीले व लाल कपड़ों से सजाया जाता है। बहन देवी सुभद्रा का रथ ‘पद्मध्वज’ या ‘दर्पदलन’ कहलाता है, जिसकी ऊंचाई 43 फीट होती है। इस रथ में 12 पहिये होते हैं और इसे काले व लाल रंग के वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है। प्रत्येक वर्ष इन रथों का निर्माण नए सिरे से किया जाता है, जिसके लिए लकड़ियों का चयन अक्षय तृतीया के पावन दिन से शुरू होता है।रथ यात्रा में सबसे आगे बलभद्र का रथ होता है, और उसके पीछे क्रमशः देवी सुभद्रा और महाप्रभु के रथ होते हैं।

 

धार्मिक परंपरा के अनुसार, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को यह भव्य यात्रा शुरू होती है। भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने मुख्य मंदिर से विदा होकर करीब तीन किलोमीटर दूर अपनी मौसी के घर, यानी ‘गुंडिचा मंदिर’ के लिए प्रस्थान करते हैं। गुंडिचा मंदिर को भगवान की जन्मवेदी भी माना जाता है। वहां पहुंचने के बाद तीनों विग्रह पूरे सात दिनो तक अपनी मौसी के घर आतिथ्य सत्कार ग्रहण करते हैं। इस अवधि के दौरान गुंडिचा मंदिर में भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ता है। इसके बाद, आषाढ़ शुक्ल दशमी तिथि को भगवान की वापसी यात्रा शुरू होती है, जिसे ‘बहुड़ा यात्रा’ कहा जाता है। मुख्य मंदिर लौटने से पहले रथ ‘मौसी मां मंदिर’ पर रुकते हैं, जहां भगवान को उनकी मौसी द्वारा तैयार किया गया विशेष ‘पोडा पीठा’ (एक प्रकार का पारंपरिक मीठा केक) का भोग लगाया जाता है। इसके बाद तीनों रथ पुनः जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार पर पहुंचते हैं। मंदिर में प्रवेश से पहले भगवान का ‘सुना बेष’ (स्वर्ण शृंगार) होता है, जिसमें उन्हें शुद्ध सोने के अत्यंत भारी आभूषणों से सजाया जाता है। इसके बाद ‘अधर पना’ की रस्म और अंत में ‘नीलाद्रि बिजे’ के साथ भगवान गर्भगृह में अपने रत्न सिंहासन पर पुनः विराजमान हो जाते हैं। करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा का केंद्र यह उत्सव मानवीय बंधुत्व, समर्पण और सनातन परंपरा का सबसे जीवंत प्रतीक है।

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