संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

भारत की प्रगति में अनूठा योगदान देता पारसी समुदाय: इतिहास, संस्कृति और विरासत।
16 अगस्त 2026 को देश भर में पारसी समुदाय द्वारा शहनशाही नव वर्ष (नवरोज) का त्योहार अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। शहनशाही कैलेंडर की गणना अंतिम ससानिद फ़ारसी सम्राट यज़दगर्द तृतीय के 632 ईस्वी में हुए राज्याभिषेक से की जाती है, जिसके अनुसार इस वर्ष पारसी संवत 1395 की शुरुआत हो रही है। लगभग 1390 से अधिक वर्षों की यह अटूट परंपरा पारसियों के समृद्ध अतीत की गवाह है। आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच फारस (आधुनिक ईरान) पर अरबों के आक्रमण और धार्मिक अत्याचारों के बाद अपने जोरोस्ट्रियन (पारसी) धर्म और पवित्र अग्नि की रक्षा हेतु पारसियों ने पलायन किया था। वे समुद्री मार्ग से गुजरात के संजन तट पर पहुँचे, जहाँ के स्थानीय राजा जादी राणा ने उन्हें शरण दी। दूध में शक्कर की तरह घुलकर देश में मिठास घोलने के अपने ऐतिहासिक वादे को पारसी समुदाय ने भारत की पावन धरा पर पूरी तरह सच कर दिखाया है।
आज भारत में पारसियों की अधिकांश आबादी मुंबई (महाराष्ट्र) और गुजरात के शहरी क्षेत्रों में निवास करती है। धार्मिक दृष्टि से यह समुदाय ईश्वर की पवित्रता और ऊर्जा के प्रतीक के रूप में अग्नि और जल को पूजता है, इसलिए इनके मंदिर को ‘आतिश बहराम’ (अग्नि मंदिर) कहा जाता है। इनकी अंतिम संस्कार प्रक्रिया भी अद्वितीय है; पार्थिव शरीर को जलाया या दफनाया नहीं जाता, बल्कि ‘टावर ऑफ साइलेंस’ (दखमा) में रखा जाता है ताकि सूर्य की किरणों और पक्षियों के माध्यम से देह का प्राकृतिक चक्र पूरा हो सके और पृथ्वी, जल व अग्नि प्रदूषित न हों। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में पारसियों की जनसंख्या घटकर लगभग 57,264 ही रह गई थी। इस तीव्र गिरावट का मुख्य कारण अत्यधिक कम प्रजनन दर, देर से विवाह होना, अविवाहित रहने की प्रवृत्ति, समुदाय से बाहर विवाह करने पर कठोर धार्मिक नियम और विदेशों में प्रवासन है।
संख्यात्मक रूप से अत्यंत सूक्ष्म होने के बावजूद भारत के आर्थिक, औद्योगिक, सैन्य, वैज्ञानिक और सामाजिक निर्माण में पारसियों का योगदान अप्रतिम है। भारतीय उद्योग जगत की नींव रखने वाले जमशेदजी टाटा को ‘भारतीय उद्योग का जनक’ माना जाता है, जिन्होंने टाटा समूह की स्थापना की। इसके अतिरिक्त अरदेशिर गोदरेज और पिरोजशा गोदरेज का ‘गोदरेज समूह’, नुसरवानजी वाडिया द्वारा स्थापित ‘बॉम्बे डाइंग’ (वाडिया समूह), तथा साइरस पूनावाला का ‘सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया’ भारत के आर्थिक और स्वास्थ्य ढांचे की रीढ़ हैं। रक्षा क्षेत्र में भारत के प्रथम फ़ील्ड मार्शल सैम मानिकशॉ का 1971 के युद्ध में अदम्य साहस और रणनीतिक नेतृत्व भारतीय सैन्य इतिहास का गौरवशाली अध्याय है। नौसेना प्रमुख एडमिरल जल करसेटजी और वायुसेना प्रमुख फ़ाली होमी मेजर ने भी भारतीय सशस्त्र बलों को शीर्ष नेतृत्व प्रदान किया।
वैज्ञानिक और बौद्धिक क्षेत्र में भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा का नाम सर्वोपरि है, जिनकी दूरदर्शिता से भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बना। स्वतंत्रता संग्राम और राजनीति में ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ दादाभाई नौरोजी (जो ब्रिटिश संसद के पहले भारतीय सदस्य बने), फिरोजशाह मेहता और मैडम भीकाजी कामा (जिन्होंने विदेशी धरती पर पहली बार भारतीय ध्वज फहराया) का योगदान अविस्मरणीय है। न्याय क्षेत्र में नानी पालकीवाला, फली नरीमन और सोली सोराबजी जैसे महान कानूनविदों ने भारतीय संविधान के सिद्धांतों की रक्षा की, जबकि संगीत जगत में ज़ुबीन मेहता ने वैश्विक मंच पर भारत का परचम लहराया। अपनी निष्ठा, उद्यमशीलता, परोपकार और शांतिप्रियता के बल पर यह छोटा सा समुदाय भारत के राष्ट्र-निर्माण का एक अनिवार्य और प्रेरणादायक स्तंभ बना हुआ है।







