डाॅ. सोमनाथ शुक्ल
प्रयागरा, उत्तर प्रदेश
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
अस्सीवाँ स्वाधीन पर्व यह,
गूँज रहा जयघोष गगन में।
उदित हुआ स्वर्णिम विहान यह,
नव-चेतन जागा जन-जन में।
याद करें हम उन वीरों को,
हँसकर जो फाँसी पर झूले।
मातृभूमि की बलिवेदी पर,
निज प्राणों की ममता भूले।
गूँजे उनकी अमर कहानी,
आज तिरंगे के आँगन में।
अस्सीवाँ स्वाधीन पर्व यह,
गूँज रहा जयघोष गगन में।
धूप, छाँव, वर्षा को सहकर,
स्वेद-धार से देह भिगोया।
कठिन श्रमों से धरा सँवारी,
कृषकों ने तब स्वर्ण सँजोया।
उसी पसीने की सुगंध है,
यह आज़ादी इस प्रांगण में।
अस्सीवाँ स्वाधीन पर्व यह,
गूँज रहा जयघोष गगन में।
सत्य-अहिंसा के पथ पर हम,
बढ़ते जाएँ सीना ताने।
कर्म-योग की इस धरती का,
सारा जग अब लोहा माने।
नया सूर्य चमका है देखो,
नई आस है हर धड़कन में।
अस्सीवाँ स्वाधीन पर्व यह,
गूँज रहा जयघोष गगन में।







