राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
दो लफ्जों का था जो रिश्ता,
वो एक बात पर टूट गया,
कल तक अपना सा लगता था,
वो पल भर में छूट गया।
सदियों की बातें थीं दरमियां हमारे,
अनकहा जुमला, सारे वादे लूट गया।
बेवफाई का लम्हा, गहरा जख्म दे गया,
मोहब्बत सच्ची थी, सब्र का दामन छूट गया।
वो जो गुरूर था, अपनी सच्चाई पर,
उसी अना की एक दीवार से
नाजुक शीशा टूट गया।
खामोशी ने ली जगह फिर,
जो बातें कहनी थीं रह गईं,
दो लफ्जों का हसीं सफर,
बस एक बात पर रूठ गया।







