राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
दर्दे-दिल का, सबब बता दीजिए,
हकीम न सही, हमदर्द बना लीजिए।
आँसुओं की भाषा तो समझ लीजिए,
खामोशी के पर्दे, जरा हटा दीजिए।
जो दर्द सीने में, दफ्न पड़ा है,
उसे ज़ुबान देकर, जगा दीजिए।
न दवा की, तहरीर लिखने कह दीजिए
न नुस्ख़े की, फेहरिस्त बनाइए।
बस एक नजर में मेरा हाल पढ़ लीजिए
और दिल की किताब खोल दीजिए।
ये जख्म पुराने हैं, ताजा नहीं,
ये साँसें उदासी से भारी हैं।
अगर इलाज मुमकिन न हो सके,
तो सिर्फ हमदर्दी का हाथ थाम लीजिए।
दर्दे-दिल का सबब बता दीजिए,
हकीम न सही, हमदर्द बना लीजिए।







