राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
बसंत बहार में, गुलों का पता नहीं मिलता,
इश्क़ से जुस्तजू का, वास्ता नहीं मिलता।
किसी की हसरतें, कभी पूरी नहीं होतीं,
सोते इंसान को, काफ़िला नहीं मिलता।
बिरहा वीराने में, मधुर यादें खो जातीं हैं,
प्यास को सावन का, साया नहीं मिलता।
चराग़ों की कतारें, बुझ जाती हैं रात को,
अँधेरे को कभी, रौशन सितारा नहीं मिलता।
तूफ़ान में डूबती में, कश्तियां डूब जाती हैं,
चाहत की राह में, कोई सहारा नहीं मिलता।
ग़म की रातों में, चाँद चमक जाता है रंजन,
दर्दे दिल को, सुकून का प्याला नहीं मिलता।







