सुरेन्द्र अग्निहोत्री
ए-305, ओ.सी.आर.
विधान सभा मार्ग; लखनऊ
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“आदि तीर्थ नैमिष” पुस्तक से अनेक नए तथ्य सामने आते हैं
आदि तीर्थ नैमिष की प्राचीन काल के इतिहास से लेकर वर्तमान तक की गाथा को सरल और सहज शब्दों में लिखा है पंडित बलराम मिश्र ने अनेक वर्षों के शोध और 84 कोशीय यात्रा के सभी स्थलों पर अनेक बार जा करस्मृतियों और अनुभवों को अभिव्यक्त किया है। चतुर्थ अध्यायों में समाहित “आदि तीर्थ नैमिष” पुस्तक से अनेक नए तथ्य सामने आते हैं।हमारे गौरव और स्वर्णिम काल की याद दिलाता
नैमिषारण्य तीर्थ अव्यक्त परमात्मा की इच्छा से संचालित सष्टि चक्र परमाण्विक संरचना सिद्धान्त से स्पष्ट किया गया है कि के उद्भव प्रलय को प्रदर्शित करने वाला गुह्य बिन्दु स्थल है।
प्रलयावस्था में स्थित संसार को व्यक्त करने वाली प्रथम प्रकाश किरण “नैमिष तीर्थ” से ही प्रकट होती है। इसी नैमिष क्षेत्र से व्यामोह कारिणी माया शक्ति जो कि संसार चक्र की नेमिरूपा है वह भी शीर्ण होकर प्रलयावस्था का द्योतन करती है। अतः मनोमय चक्र शक्ति चक्रादि की नेमि शीर्ण स्थल होने से नैमिष या नैमिषारण्य नाम से विख्यात है भौतिक जगत में नैमिष तीर्थ ही वह स्थान विशेष है जहां से परमेश्वर की इच्छा शक्ति के संकेत पर चलने वाले जगत का सृष्टि और प्रलय लीला का खेल प्रकाशित होता है। शिवपुराण व वायु पुराण कथन :
ब्रम्हाण्ड एवं वायु पुराण का कथन है कि आदिकाल में ब्रम्हा सृष्टि सृजन जैसे पावन यज्ञ कार्य को किसी पावन पवित्रतम योग्य इच्छा जगत्पालक भगवान विष्णु से उस पावन यज्ञ स्थली को जानने की इच्छा तो श्री हरि ने कहा-
गच्छतो धर्म चक्रस्य यत्रनेमि रशीर्यत ।
पुण्य संदेशः मन्तव्यः इत्युवाच वृहस्पतिः ॥
गच्छतो धर्म चक्रस्य नेमिशीर्णो अत्र पश्यतः ।
अर्थतः नैमिषे प्रोक्तं क्षेत्रं परम पावनः ॥
उपरोक्त वचनों का गूढ़ अभिप्राय है कि श्री विष्णु देव ने उस विज्ञान सम्मत सिद्धान्त की स्मृति ब्रह्मदेव को कराई, जिसके मूलबिन्दु में का बनना बिगड़ना निहित है। यहां श्री विष्णु देव ने सृष्टि के स्थान पर धर्म शब्द का प्रयोग कर बताया कि जहां जिस स्थान पर अव्यक्त चेतन पुरूष व अव्यक्त प्रकृति संघर्षण ग्रहण कर गुण साम्य अवस्था में स्थित सृष्टि उन्मुख होता है वह पवित्र क्षेत्र यज्ञोपयोगी होगा। उन्होंने निर्देश किया कि भूतल में जिस स्थान पर नमिभूता त्रिगुणा प्रकृति चेतना रहित शान्त (शीर्ण) होती देखी जाय वह स्थान ही जन्म स्थित आदि उपयोगी जन कार्य का मूल बिन्दु होगा।
श्री ब्रह्मा जी ने अनुसंधान का इस नेमिशीर्ण स्थल को नैमिष अरण्य (नैमिषारण्य) संज्ञा से सम्बोधित किया।
पुस्तक की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए लेखक ने अपने दायित्व का पूरी तरह पालन किया है।
कुल मिलाकर लेखक ने सरल, प्रभावशाली और सबको समझ में आने वाली भाषा का उपयोग कर सनातन जीवन मूल्यों से साक्षात्कार कराने बाले आदि तीर्थ की गौरव गाथा से परचित कराया है।
पुस्तक: “आदि तीर्थ नैमिष”
लेखक: पंडित बलराम मिश्र
प्रकाशन: शतरंग प्रकाशन
एस-43, विकास दीप बिल्डिंग,
दूसरी मंजिल, स्टेशन रोड, लखनऊ-226001
ईमेल:Ltp284403@gmail.com
मूल्य:480







