अदिती कुशवाहा
बैकुण्ठपुर (कोरिया)
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण)
(यह कविता उन संतानों के लिए है जो अपने माता-पिता को घर से निकाल देते हैं, और वह मां सड़कों पर बैठकर ऐसी विचार करती है)
देख मैं तेरी मां हूं
60-70 की उम्र है मेरी,
उम्र देखकर कुछ तो शर्म कर ले
मां हूं मैं तेरी …
बेटा तेरी जरूरत है मुझे।
देख कैसी हालत है मेरी
आज सड़को पर पड़ी हूं मैं,
थोड़ी सी जान बची है मेरी।
आखरी सांसों तक
मुझे अपने हाथों से भोजन कराओगे क्या,
जो प्यार मैंने बचपन में तुझे दिया, क्या उसको लौटा पाओगे?
तेरे चेहरे पर मुस्कान जब भी आती थी,
उसे देखकर मैं मुस्कुराती थी।
ए मेरे बच्चे,
नहीं चाहिए मुझे तेरी कोई और ना ही मेरी संपति ले लेना तू मुझसे, जो होगा मेरा।
लेकिन खुद से दूर मत कर मुझे, अपने हाथों की लकीरों को काटकर मैंने तुझको पाला है, अपने हिस्से की हर खुशी
तुझे देने की कोशिश की है।
क्या अभी भी तेरा दिल पत्थर का है,
जो मेरे हृदय के पीड़ा को समझ भी नहीं सकते?
मां नहीं तो इंसान ही समझ ले मुझे,
यूँ सड़कों पर मत फेंक मुझे,
यूँ लाचार मत होने दे।
जो सपना देखी थी मैंने तेरे साथ बिताने की,
कुछ ना सही तो अपने पास ही रख ले।
देख, तेरी माँ के कैसे हालात बन गए,
जो एक घूँट पानी के लिए भी सड़क पर लाचार तड़प रही है।






