आचार्य अवधेश झा
गंघटी आश्रम, धर्मागत पुर
पिलखी गजपति, मुरौल
मुजफ्फरपुर, बिहार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
अश्रुधारा
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(सावन की वर्षांत)
काठ काठ से आग जला दो बाबू जी !
सावन की बर्षात भगा दो बाबू जी!!
बचपन भर कोड़े कांधे पे रखते थे
बाबू जी मेरे कभी न थकते थे
है वसंत की बेला
बचपन वाला राग़ (लोड़ी) सुना दो बाबू जी
सावन की वर्षांत भगा दो बाबू जी!!
फंटे पुराने कपड़े पहने रहते थे !
खूब पढ़ो बेटा ये हमसे कहते थे!!
कुछ भी फर्माइश करदो पूरी होती !
जैसे घर में खूब भरे हों हीरे मोती!!
है ख्वाहिश इतनी,
कुछ राग़ जगा दो बाबू जी!
सावन की वर्षांत भगा दो बाबू जी!!
कुछ अनबन कुछ गुनधुन मां बाबू जी का
याद आ रहा समय पुराना बाबू जी का
पैसो की तंगी
तबियत रूठी समझो
तेज तप रहा तन मन
बातें मीठी समझो
ना समझी में
समझ बढ़ा दो बाबू जी
सावन की वर्षांत
भगा दो बाबू जी
दिन दोपहरी काम काम आराम नहीं
जबतक पैसे न आये विश्राम नहीं
कुछ खाने पीने की वस्तु ले आना
पर समय ⌚ से पढ़कर ही घर को आना
वैसा फिर विस्वास जगा दो बाबू जी
सावन की वर्षांत भगा दो बाबू जी
दूध मलाई छांछ हमारे लिए सदा
रूखी सूखी खाते रहते थे सदा सदा
हमको देते उपदेश सदा सच्चाई का
वो मानव मूरत थे अच्छाई का
भूल रहा हूं ज्ञात करा दो बाबू जी
सावन की वर्षांत भगा दो बाबू जी
हर खिदमत करते रहते वो हम सबकी
पकड़े पुस्तक आ जाती हमको झपकी
लार प्यार से हमें पढ़ा दो बाबू जी
सावन की वर्षांत भगा दो बाबू जी
आज आपकी कमी हमें जो खलती है
पहले वाली खुशी कहां अब मिलती है
मन के कोने मे हर दम इक क्रंदन है
पर सदा प्रस्फुटित आपका हीं अभिनंदन है
सतरंगी सी राग जगा दो बाबू जी
सावन की वर्षांत भगा दो बाबू जी
है कितने हीं दुश्मन इन अच्छाई के
भाई हीं दुश्मन बन बैठे हैं भाई के
फिर से वो विस्वास जगा दो बाबू जी
सावन की वर्षांत भगा दो बाबू जी






