पितृपक्ष: पित्रों के स्वागत, आशीष, नमन और वंदन का महापर्व

Spread the love

 

डॉ.दीपक गोस्वामी

 

                (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

         पितृपक्ष: पित्रों के स्वागत, आशीष,

                नमन और वंदन का महापर्व

 

मनुष्य अपने जन्म का निर्माता स्वयं नहीं होता। उसकी देह, भाषा, संस्कार, परिवार और जीवन की आधारभूमि उसके पहले की पीढ़ियों से आती है। जिनके कारण हम हैं, उनके प्रति कृतज्ञ होना ही पितृऋण की पहली पहचान है और उसी कृतज्ञता का संस्कारित रूप है श्राद्ध। महालय इसी कृतज्ञता का महापर्व है। भारतीय परंपरा की भावभूमि में पितृपक्ष वह विशेष काल है जब मनुष्य अपनी जड़ों की ओर लौटता है। 

         वैदिक वाङ्मय में पित्रो के लिए स्वधा, तर्पण और स्मरण की परंपरा मिलती है। वाजसनेयी संहिता में पिता, पितामह और प्रपितामह के लिए स्वधा अर्पित करने का मंत्र है। अथर्ववेद के पितृमेध सूक्तों में पित्रों और यम का स्मरण मिलता है। आगे चलकर धर्मसूत्रों और स्मृतियों ने इस पितृचेतना को विस्तृत श्राद्ध-विधि का रूप दिया। इसलिए श्राद्ध केवल मृतक के नाम पर किया जाने वाला कर्मकाण्ड नहीं है, यह जीवित मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़ने वाला संस्कार है।

           2026 में 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध और 27 सितंबर से पितृपक्ष का मुख्य क्रम आरम्भ होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर पूर्ण होगा। इन दिनों को केवल तिथियों की श्रृंखला न मानें। इन्हें स्मृति से संस्कार तक की सीढ़ियाँ माने।

 

 स्वागत

 

        पितरों का स्वागत सबसे पहले घर की सफाई से नहीं, मन की सफाई से हो। क्रोध कुछ समय के लिए बाहर रखिए। कटुता छोड़िए। परिवार के वृद्धों का सम्मान कीजिए। जिस घर में जीवित माता-पिता उपेक्षित हों और मृत पूर्वजों के नाम पर वैभव का प्रदर्शन हो, वहाँ श्राद्ध का बाहरी विधान अपने ही अर्थ से प्रश्न करता है।

 

नमन

 

          नमन का अर्थ केवल सिर झुकाना नहीं, यह स्वीकार करना है कि हमारी उपलब्धियाँ अकेली हमारी नहीं हैं। हमारे पीछे श्रम, त्याग और संस्कार की अनेक पीढ़ियाँ खड़ी हैं। तिल और जल की अंजलि इसी कृतज्ञता को कर्म का रूप देती है।

 

स्मरण

 

            पूर्वजों को केवल उनकी मृत्यु की तिथि से नहीं, उनके जीवन-मूल्यों से याद कीजिए। उनका श्रम, सत्य, साहस, त्याग और वह सीख जो अगली पीढ़ी को बेहतर बना सकती है,यही जीवित पितृस्मृति है।

 

 तर्पण

 

            तर्पण केवल जल छोड़ना नहीं, तृप्ति की भावना है। जल जीवन का प्रतीक है, इसलिए पितृस्मरण में जल अर्पित करना गहरी प्रतीकात्मकता रखता है पर तर्पण का भाव पूजा-स्थान तक सीमित न रहे। किसी प्यासे को जल, किसी भूखे को अन्न और किसी जीव को आश्रय मिले, तभी श्रद्धा जीवन में उतरती है।

 

आशीष

 

       पितरों से केवल धन और वैभव न माँगें। उनसे ऐसी बुद्धि और चरित्र की प्रार्थना करें कि हमारी अगली पीढ़ी हमें स्मरण करते हुए गर्व अनुभव करे। सबसे बड़ा पितृआशीष वही है जो मनुष्य को बेहतर मनुष्य बना दे।

 

अन्न

 

                अन्न जीवन का आधार है। इसलिए पितृस्मरण में अन्नदान का भाव अत्यंत अर्थपूर्ण है। पितरों के नाम पर बनाया भोजन यदि किसी भूखे तक पहुँच जाए तो स्मृति करुणा बन जाती है और करुणा संस्कार।

 

 मातृवंदन

 

          पितृस्मरण में मातृशक्ति का स्थान अविभाज्य है। जिसने शरीर दिया, जिसने अपने सुख त्यागकर संतान को पाला, उसकी स्मृति केवल एक तिथि की मोहताज नहीं। मातृनवमी जैसी परंपराएँ इसी भाव को विशेष रूप देती हैं। इस दिन घर की वृद्ध मातृशक्ति का सम्मान और उनकी स्मृतियों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना स्वयं एक जीवित वंदन है।

 

संस्कार

 

        वंश पर गर्व करना सरल है, वंश के संस्कार को जीवित रखना कठिन। यदि पूर्वज सत्यनिष्ठ थे और हम सुविधा के लिए असत्य स्वीकार कर लें, तो हमने उनका नाम बचाया, विरासत नहीं। पितृपक्ष में हम स्वयं से प्रश्न करें कि हम अपनी संतानों को क्या देंगे- संपत्ति या चरित्र?

 

क्षमा

 

              हर परिवार की स्मृति में कुछ अधूरे रिश्ते, कुछ पुराने दुःख और कुछ अनकहे शब्द होते हैं। महालय उन्हें विष बनाकर ढोते रहने का नहीं, उनसे सीखकर आगे बढ़ने का अवसर है।

क्षमा अतीत को बदलती नहीं, पर वर्तमान को मुक्त करती है।

 

सेवा

 

                पितृऋण को आधुनिक जीवन में जीवित रखने का सबसे सशक्त माध्यम सेवा है। किसी वृद्ध की सहायता, किसी विद्यार्थी की पुस्तक, किसी निर्धन परिवार का भोजन, किसी असहाय की चिकित्सा, पित्रों के नाम पर किया गया ऐसा कर्म स्मृति को सामाजिक उत्तरदायित्व में बदल देता है।

 

प्रकृति वंदन

 

            हमारे पूर्वज मिट्टी, जल, वृक्ष, पशु और ऋतुओं के साथ जीवन जीते थे। इसलिए महालय में एक वृक्ष लगाना, जल बचाना और अन्न की बर्बादी रोकना भी उस जीवन-दृष्टि के प्रति सम्मान है जिसने प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं माना।

 

अंतिम जन

 

        पितृस्मरण यदि केवल अपने परिवार तक सीमित रह जाए तो उसका सामाजिक विस्तार अधूरा है। किसी ऐसे व्यक्ति तक सहायता पहुँचाइए जिसे समाज ने पीछे छोड़ दिया है। पित्रों के नाम पर किया गया एक निःस्वार्थ कार्य हमारी श्रद्धा को परिवार की सीमा से समाज तक ले जाता है।

 

अज्ञात पूर्वज

 

       हम उन पूर्वजों को जानते हैं जिनकी तस्वीरें हमारे पास हैं, पर उन असंख्य लोगों को कौन याद करेगा जिनके नाम समय ने मिटा दिए? महालय उन ज्ञात-अज्ञात सभी पूर्वजों के प्रति सामूहिक कृतज्ञता का अवसर है।

 

सर्वसमर्पण

 

       अब स्मरण केवल अपने परिवार के ज्ञात पित्रों तक सीमित नहीं रहता। भाव व्यापक होता है कि जो छूट गए, जिनकी तिथि ज्ञात नहीं, जिनका विधिवत स्मरण न हो सका, उन सबके प्रति नमन।

        इसके बाद सर्वपितृ अमावस्या इस पितृस्मरण को व्यापक समर्पण देती है। यहीं महालय का वास्तविक दर्शन सामने आता है कि पितृपक्ष मृतकों का उत्सव नहीं, जीवितों की कृतज्ञता का संस्कार है। वेद में स्वधा है, परंपरा में तर्पण है, धर्मशास्त्र में विधि है और आधुनिक जीवन के लिए इसका संदेश है कि अपनी जड़ों को पहचानो और उनसे मिली श्रेष्ठता को आगे बढ़ाओ।

इस महालय को एक नया रूप दिया जा सकता है-

एक पितर,एक वृक्ष।

एक पितर, एक अन्नदान।

एक पितर, एक वृद्ध की सेवा।

एक पितर, एक बालक के संस्कार का संकल्प।

एक पितर, एक श्रेष्ठ पारिवारिक परंपरा का पुनर्जागरण।

                   तब ये दिन केवल पंचांग में नहीं रहेंगे, वे हमारे व्यवहार में उतरेंगे। तब पित्रों का सबसे बड़ा स्वागत फूलों से नहीं, संस्कारों से होगा। सबसे बड़ा तर्पण केवल जल से नहीं, सेवा से होगा।

                   सबसे बड़ा नमन केवल झुके हुए मस्तक से नहीं, विनम्र चरित्र से होगा और सबसे बड़ा वंदन तब होगा जब हमारी अगली पीढ़ी हमारे पूर्वजों के श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों को आगे बढ़ाएगी।

                            महालय में दीप जलाइए, तर्पण कीजिए, पितरों का स्मरण कीजिए और अपने भीतर एक प्रश्न जगाइए कि “जब आने वाली पीढ़ी मुझे स्मरण करेगी, तब मेरे जीवन से उसे क्या मिलेगा?”

यही प्रश्न श्राद्ध को कर्मकाण्ड से संस्कार में बदल देता है। यही इन दिनों का नव्य प्रबोध है।

 

पितृप्रसादात् परमं पदम्।

 

           पितरों की स्मृति हमारे घर में सुख बने, हमारे व्यवहार में सद्भाव बने, हमारी संतानों में संस्कार बने और हमारे समाज में करुणा बनकर प्रवाहित हो, यही महालय की सच्ची पूर्णाहुति है।

    पितरों को केवल याद मत कीजिए, उन्हें अपने श्रेष्ठ कर्मों में जीवित रखिए। 

  • Related Posts

    प्रकृति का अनुपम उपहार निर्मल नदियां हुई अब मैली-मैली       

    Spread the love

    Spread the love  प्रमोद दीक्षित मलय                 (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)    विश्व नदी दिवस प्रकृति का अनुपम उपहार निर्मल नदियां हुई अब मैली-मैली  …

    खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर उठते सवाल।

    Spread the love

    Spread the love  आर.सूर्य कुमारी              (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)         खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर उठते सवाल।   खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    प्रकृति का अनुपम उपहार निर्मल नदियां हुई अब मैली-मैली       

    • By User
    • September 25, 2026
    • 11 views
    प्रकृति का अनुपम उपहार निर्मल नदियां हुई अब मैली-मैली        

    खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर उठते सवाल।

    • By User
    • September 25, 2026
    • 7 views
    खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर उठते सवाल।

    विश्व फार्मासिस्ट दिवस के अवसर पर फार्मा शिष्टों का हुआ सम्मान।

    • By User
    • September 25, 2026
    • 5 views
    विश्व फार्मासिस्ट दिवस के अवसर पर फार्मा शिष्टों का हुआ सम्मान।

    मां-बच्चे के पोषण पर जोर, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को मिला सम्मान।

    • By User
    • September 25, 2026
    • 8 views
    मां-बच्चे के पोषण पर जोर, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को मिला सम्मान।

    मथुरा में प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा का राष्ट्रीय सम्मेलन 26 से, जुटेंगे 175 से अधिक साहित्यकार।

    • By User
    • September 25, 2026
    • 12 views
    मथुरा में प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा का राष्ट्रीय सम्मेलन 26 से, जुटेंगे 175 से अधिक साहित्यकार।

    विसर्जन से पहले अलियापुर घाट का डीएम-एसपी ने लिया जायजा, गोताखोरों के साथ एंबुलेंस व मेडिकल टीम रहेगी तैनात।

    • By User
    • September 25, 2026
    • 12 views
    विसर्जन से पहले अलियापुर घाट का डीएम-एसपी ने लिया जायजा, गोताखोरों के साथ एंबुलेंस व मेडिकल टीम रहेगी तैनात।