वह जो एक शब्द है।

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राजकुमार कुम्भज, जवाहरमार्ग, इन्दौर

 

             (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

___________________

वह जो एक शब्द है।

___________________

वह जो एक शब्द है

मैं उसे एक अच्छे वाक्य में

हूबहू बदल देना चाहता हूँ तत्काल 

मेरे पास शब्द नहीं हैं।

 

वह जो एक वाक्य है

मैं उसे एक अच्छे वक्तव्य में

हूबहू बदल देना चाहता हूँ तत्काल 

मेरे पास वाक्य नहीं है।

 

वह जो एक वक्तव्य है

मैं उसे एक अच्छी भाषा में

हूबहू बदल देना चाहता हूँ तत्काल 

मेरे पास वक्तव्य नहीं है।

 

वह जो एक भाषा है

मैं उसे एक अच्छी कविता में

हूबहू बदल देना चाहता हूँ तत्काल 

मेरे पास भाषा नहीं है।

 

वह जो एक कविता है

मैं उसे एक अच्छे आदमी में

हूबहू बदल देना चाहता हूँ तत्काल 

मेरे पास कविता नहीं है।

 

वह जो एक आदमी है

मैं उसे एक अच्छे प्रधानमंत्री में

हूबहू बदल देना चाहता हूँ तत्काल 

मेरे पास आदमी नहीं है।

___________________

      आवाज

___________________

जिसे मैंने

भय-सहित कहा

वह भय-रहित रहा

और जिसे मैंने

भय-रहित कहा

वह भय-सहित रहा

मगर मेरे कहने भर से

होता ही क्या है?

 

जँगल में मोर नाचा

जँगल में मोर के नाचने से 

होता ही क्या है?

नाचा, जँगल में मोर नाचा

देखा किसने?

 

कभी-कभी

गॅंजे के सिर में भी

हो ही जाती है खाज

होते हैं नक्कारखाने भी होते हैं 

जहाँ, सिर्फ नगाड़ों की ही नहीं

तूती की भी होती है आवाज 

लो, देख लो, वहाँ, उधर

हो रही है सुर्ख-स्वर्णिम सुबह 

और एक बार फिर।

___________________

 तब यही तो होना था

___________________

तब, यही तो होना था

क्योंकि ईमानदारी का रोना था

जो कि एहसास-ए-कमतरी में

सिर्फ बद-ज़ुबान होना था

पता नहीं, जिंदगी का 

ये कौन-सा कोना था

जिसमें सिर्फ होना था 

कि सिर्फ रोना था?

 

और अगर सिर्फ रोना था

तो फिर होना क्या और क्यों होना था

और अगर सिर्फ होना ही होना था

तो फिर ये कैसा रोना था?

 

क्यों नहीं, क्यों नहीं 

तब ये जरुरी सच होना था

और क्यों नहीं, क्यों नहीं 

सच से टकराने का

थोड़ा-थोड़ा साहस भी 

कहीं होना था?

 

शायद, साहस के होने

अथवा नहीं होने का रोना था

तब, यही तो होना था।

___________________

  हर एक दिन युद्ध-क्षेत्रे।

___________________

हर एक दिन युद्ध-क्षेत्रे

हर हाल जो लगते रहे लक्ष्य पर

सचमुच वे ही कहलाए तीर

जो लड़े और-और मरे युद्ध-क्षेत्रे 

सचमुच वे ही कहलाए वीर।

 

मैं, अपने सिर ऊपर 

रखता हूँ तीर और तीर-ऐ-नजर

और सीने में भरता हूँ हौसला अपार 

मैं, हर एक दिन लड़ता हूँ एक युद्ध 

नए जीवन के लिए हर एक दिन 

और मरता हूँ अंदर ही अंदर

हर एक दिन।

 

मैं, हर एक दिन युद्ध-क्षेत्रे

सचमुच वह तीर बनना चाहता हूँ

जो सीधे लगे लक्ष्य पर।

___________________

 

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