राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
काम
एक काम संभला नहीं, दस और खड़े हो जाते हैं,
जैसे लहरें समुद्र की, थमने का नाम न लें कभी।
पहली किरण के साथ सोचा, आज बस इतना,
शाम की आखिरी किरण, बोझ और बढ़ा गई।
ख्वाबों के ढेर, ख्याति की घंटी, और बहुत कुछ,
हर पूरा काम अधूरा, नई चुनौती खड़ा करता है।
मन कहता रुक जा, थोड़ा साँस ले ले, “रंजन”,
ज़िंदगी हँसती, कहती बस ये तो शुरुआत है।
चलते रहना ही है, जिंदगी का असली सार है,
हरेक कदम पर रोज, इम्तहान लेता संसार है।
काम हैं, आएँगे-जाएँगे, यूं ही लहरों की तरह,
तैरना सीख ले, यही तो तेरे जीवन का सार है।







