विरेन्द्र जैन माहिर
नागपुर महाराष्ट्र
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
दसलक्षण धर्म
दसलक्षण के दस चरण, दस धर्मों
का ज्ञान कराते हैं,
बाह्य पर्व से अंतर तक आत्मबोध
का ध्यान कराते हैं,
क्षमा, मार्दव, आर्जव, शुचि से कषायों का
क्षय हो जाता,
दस धर्म निज चेतन को निज स्वरूप
पहचान कराते हैं॥
दसलक्षण धर्म के दिव्य पथ पर,
चेतना का विहान हो,
दूर हो मिथ्यातम हृदय से, सम्यक्दर्शन
का उत्थान हो।
दस धर्मों की साधना से कर्मबंधन क्षीण हो जाएँ,
आत्मा के निर्मल स्वरूप का, अंतर्मन
में भान हो॥
क्षमा से शांति, मार्दव से,विनयका
मधुरिम गान है,
आर्जव की निष्कपट राहें,सत्यका
अनुपम ज्ञान हैं।
शौच, संयम, तप और त्याग से कर्मों का क्षय हो,
आकिंचन्य-ब्रह्मचर्य में,आत्मा का उत्थान है॥
भावनाओं के क्षितिज पर, तत्त्वबोध
का व्योम हो,
आत्मचेतन के गगन पर, ज्ञानरश्मियों
का उद्गम हो।
दसलक्षण के दिव्य संस्कारों से परिष्कृत
हो विचार,
जीव के आध्यात्मिक उत्कर्ष का,
नित नवीन आयाम हो॥
काल के परिवर्तन में भी, धर्म का आदर्श हो,
आचरण में सत्यनिष्ठा, चिंतन में विमर्श हो।
दसलक्षण के दिव्य संदेशों का यही अभिप्राय है,
आत्मकल्याण हेतु “माहिर” सद्गुणों का
उत्कर्ष हो॥







