सुनील कुमार वर्मा
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
ठीक कह रहे हैं
(लघुकथा)
सुखराम पैदल मार्केट से सब्जियां लेकर घर जा रहा है। सामने से एक व्यक्ति मोटरसाइकिल से आ रहा है।
वह व्यक्ति मोबाइल को अपने कंधे और गर्दन के बीच दबाए हुए है और किसी से फोन पर बातें कर रहा है। इस लापरवाही में वह सुखराम से टकरा जाता है। सुखराम गिर जाता है और उसके थैले से सब्जियां भी रास्ते में गिर कर बिखर जाती हैं। वह मोटरसाइकिल वाला सुखराम को “साॅरी” बोलता है और फिर से मोबाइल पर उसी प्रकार बातें करते हुए चला जाता है.वहां आस पास से गुजरते हुए।
दो चार लोग सुखराम के पास आकर उसे उठाते हैं और सब्जियां भी उठाकर थैले में रखकर उसे देते हैं। सुखराम
के माथे और पैरों में चोट लगी है। वह दर्द से करहाते हुए कहता है।
“आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया।”
सभी मुस्कुराते हुए उसे सांत्वना देते हैं। उनमें से एक व्यक्ति पानी की बाटल सुखराम को देता है और कहता है।
“कोई बात नही…लीजिए पानी पी लीजिए…आपको अच्छा लगेगा।“
सुखराम पानी पीता है और पानी की बाटल उस व्यक्ति को वापस करता है। वह व्यक्ति मुस्कुराते हुए अपनी पानी की बाटल ले लेता है। सुखराम कहता है।
“बताइए एक आप हैं जो मेरी इतनी सहायता कर रहे हैं और एक वह मोटर साइकिल वाला है…”
वह व्यक्ति कहता है।
“क्या बोलिएगा…एक तो टक्कर मारी और भाग गया।”
सुखराम अपनी कमर सीधी करते हुए उस मोटरसाइकिल वाले के अंदाज में अपने गर्दन और कान के बीच में मोबाइल दबाया और बोला।
“और फिर यह कौन सा तरीका है मोबाइल में बात करने का?”
वह व्यक्ति सुखराम की बातों का समर्थन करता है और कहता है।
“और नही तो क्या आप ठीक कह रहे हैं पर आज की युवा पीढ़ी को कौन समझाए?
तभी उस व्यक्ति के मोबाइल की रिंग बजती है। वह व्यक्ति काल रिसीव करने के लिए मोबाइल उठाता है और पास खड़ी अपनी मोटरसाइकिल मे बैठते हुए गर्दन में मोबाइल दबाता है बात करते हुए वहां से चला जाता है।







