कवि- अनुराग बघेल
बिजराकापा खुर्द, लोरमी,
मुंगेली (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
चेहरे की झूठी हँसी👇
(यह रचना जिम्मेदारी और संघर्षों पर आधारित है)
दर्द का यह बवंडर, अब अकेले ही झेलता हूँ,
ज़िंदगी के हर मोहरे से, मैं खुद ही खेलता हूँ।
शिकायत करूँ भी तो, आखिर किससे करूँ,
यहाँ ज़ख्म दिखाने से भी, अब मैं डरता हूँ।
तसल्ली देने वाले भी, यहाँ घाव दे जाते हैं,
जो मरहम लगाते हैं, वही दर्द बढ़ा जाते हैं।
दिखावे की इस महफिल में, जलील होना पड़ता है,
पाँव में छाले हों, फिर भी चलना पड़ता है।
कंधों पर जिम्मेदारियों का, भारी बोझ है,
यहाँ थककर बैठ जाने की, इजाजत कहाँ है।
बचपन में जो सिखाया, वही निभा रहा हूँ,
मर्द हूँ न, इसलिए आँसू छुपा रहा हूँ।
पर कोई तो पूछे इस, हँसते हुए चेहरे से,
कितना थक चुका हूँ मैं, जिंदगी के इस फेरे से।
बाहर से देखो तो, मैं आज भी हँस रहा हूँ,
पर सच तो यह है अंदर ही अंदर बिखरता जा रहा हूँ।









