राजेंद्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल
(उपन्यास भाग-1)
सन उन्नीस सौ सैंतालीस। देश आज़ाद हो चुका था, पर गाँवों और कस्बों की धूलभरी गलियों में जीवन अभी भी पुरानी रीत-रिवाज़ के सूत्रों में बँधा हुआ था। सागर जिले में लाल पत्थर के ठेकेदार खेमचंद जी का नाम दूर-दूर तक गूँजता था। उनका घर ठाठ-बाट से भरा था—दो बेटे, छेकोड़ी और उमेदी, और पाँच बेटियाँ। सबसे बड़ी बेटी हीरा की शादी का दिन तय हो चुका था। घर में मिठाइयों की खुशबू और नगाड़ों की गूँज फैली हुई थी।
जिस दिन हीरा की बारात आ ही रही थी, उसी दिन अचानक खेमचंद जी का हृदय घात से धड़कन थम गई। खुशी का माहौल एक झटके में शोक में बदल गया। बारात और रिश्तेदारों ने बड़ी सूझ-बूझ से विवाह की रस्में पूरी कीं और फिर दाह-संस्कार का क्रिया-कर्म भी निभाया। हीरा की बिदाई और पिता की अचानक मृत्यु ने विधवा पार्वती के आँगन में गहरा सन्नाटा बिछा दिया।
खेमचंद जी ने जीवन-भर मेहनत से नाम कमाया था, पर मृत्यु ने कोई चेतावनी नहीं दी। बड़ा बेटा छेकोड़ी छः फुट से ऊँचा, तेज़-तर्रार और मिलिट्री का भगोड़ा सिपाही था। पिता की मृत्यु के बाद घर की कमान उसके हाथ आ गई। साथ ही उसकी मनमानी, शराब की लत और उल्टी-सीधी हरकतें भी बढ़ती चली गईं। पहले खुद बीमार पड़ा, फिर पत्नी को तपेदिक ने जकड़ लिया। घर की इज़्ज़त धीरे-धीरे धूल में मिलने लगी।
छेकोड़ी ने सौतेली माँ पार्वती को इतना सताया कि वह अपनी चार बेटियों को लेकर सिमरिया गाँव अपने भाई के घर चली गई। भाई गाँव के मुखिया थे। इधर छेकोड़ी ने जैसे-तैसे अपनी तीन बेटियों की शादी कर दी, पर बेटे नारायण और मुन्ना की शादी का सपना अधूरा ही रह गया। एक दिन छेकोड़ी की पत्नी भी दुनिया छोड़कर चली गई।
अच्छा हो या बुरा खेमचंद जी की मेहनत ने परिवार को नाम दिया था, पर छेकोड़ी की लापरवाही और रंगदारी ने पूरे घर को दुख की आग में झोंक दिया। उसने उमेदी भाई के साथ भी मार-पीट की तो उमेदी घर छोड़कर अपनी ससुराल चला गया। हीरा कुछ दिन बाद ससुराल से मायके लौट आई। छेकोड़ी ने अपनी बीमारी का बहाना बनाकर हीरा की शादी में मिले जेवरात हड़प लिए। नतीजा यह हुआ कि हीरा के ससुराल वालों ने विवाह-बंधन तोड़ दिया।
(शेष भाग 2)







