ब्यूरो बिहार: कुमार संदीप
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साहित्य मार्तण्ड उदय नारायण सिंह :
बज्जिका भाषा-साहित्य के उन्नयन के अनथक साधक।
मुजफ्फरपुरः जब किसी व्यक्ति का संपूर्ण जीवन साहित्य-साधना, नैतिक मूल्यों, कर्तव्यनिष्ठा और समाजसेवा को समर्पित हो जाता है, तब उसका व्यक्तित्व स्वयं एक प्रेरणादायी ग्रंथ बन जाता है। ऐसे ही विराट व्यक्तित्व के धनी हैं साहित्य मार्तण्ड उदय नारायण सिंह, जिन्होंने अपने बहुआयामी जीवन और सृजनात्मक योगदान से हिंदी एवं बज्जिका भाषा-साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान स्थापित की है।
बिहार के सीतामढ़ी जिले के तिलक ताजपुर गांव में 18 दिसंबर 1949 को जन्मे उदय नारायण सिंह के व्यक्तित्व की जड़ें स्वतंत्रता संग्राम, साहित्यिक संस्कार और सामाजिक चेतना से जुड़ी हैं। उनके पिता स्वर्गीय विश्वनाथ प्रसाद शर्मा स्वतंत्रता सेनानी एवं साहित्यकार थे। पिता से प्राप्त वैचारिक संस्कारों ने उनके भीतर साहित्य के प्रति अनुराग और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को पुष्ट किया। उनकी जीवनयात्रा इस बात का प्रमाण है कि सच्ची साधना व्यक्ति को पद और प्रतिष्ठा से आगे बढ़कर समाज की स्मृतियों में स्थान दिलाती है।
किशोरावस्था से ही साहित्य-साधना का आरंभ-
उदय नारायण सिंह की साहित्यिक यात्रा अत्यंत कम आयु में प्रारंभ हो गई थी। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के पश्चात मात्र 13 वर्ष की अवस्था में उन्होंने झिझिया की लोकधुन पर अपना पहला बज्जिका गीत लिखा। इस गीत में तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों और राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति थी। शारदीय नवरात्र के अवसर पर ग्रामीणों द्वारा मंचित नाटक में इस गीत को भी प्रस्तुत किया गया। देखते ही देखते यह गीत लंबे समय तक ग्रामीण जनमानस की जुबान पर बना रहा।
यह घटना उनकी आरंभिक रचनात्मक प्रतिभा के साथ-साथ लोकभाषा और लोकसंस्कृति से उनके गहरे जुड़ाव को भी रेखांकित करती है। उनके लिए बज्जिका केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि जनजीवन की संवेदना, सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक चेतना की सशक्त अभिव्यक्ति रही है।
उन्होंने बीए ऑनर्स, एमए और एलएलबी तक शिक्षा प्राप्त की तथा बिहार विश्वविद्यालय से मेधा छात्रवृत्ति हासिल की। कविता एवं आलेख प्रतियोगिताओं में उनकी प्रतिभा को तत्कालीन लंगट सिंह कॉलेज के प्राचार्य डॉ. नवल किशोर गौड़ और तत्कालीन कुलपति जब्बार हुसैन से प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान प्राप्त हुआ। लंगट सिंह कॉलेज की पत्रिका वैशाली में उनकी कविताएं और आलेख प्रकाशित हुए। इसी पत्रिका में प्रकाशित उनकी कविता इरादा ने विशेष लोकप्रियता अर्जित की।
वर्ष 1970 में उनकी बज्जिका कहानी अक्कील के बलिहारी पत्रिका समाद में तथा हिंदी कहानी खुदखुशी पत्रिका मलय में प्रकाशित हुई। इस प्रकार किशोरावस्था से ही उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपनी साहित्यिक उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी थी।
प्रशासनिक सेवा में ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल-
साहित्य के प्रति गहरी अभिरुचि रखने वाले उदय नारायण सिंह ने जीवन में प्रशासनिक दायित्वों का भी पूरी निष्ठा से निर्वहन किया। वर्ष 1974 में वे जगन्नाथ सिंह कॉलेज, चंदौली, बेलसंड में मनोविज्ञान विभाग के व्याख्याता नियुक्त हुए। फरवरी 1975 में बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) से चयनित होने के बाद बिहार राज्य खाद्य निगम में उप प्रबंधक के पद पर नियुक्ति मिलने के कारण उन्होंने शिक्षण कार्य छोड़ दिया।
6 फरवरी 1975 से 30 अप्रैल 2011 तक उन्होंने बिहार के 17 जिलों में विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2002 से सेवानिवृत्ति तक वे बिहार राज्य खाद्य निगम में वर्ग-एक के जिला प्रबंधक पद पर कार्यरत रहे। उनके अनुसार, समयबद्धता, नियमसम्मत कार्यप्रणाली और ईमानदारी उनके कार्यजीवन के मूल आधार रहे। वे किसी कार्य या फाइल को अनावश्यक रूप से अगले दिन पर टालना उचित नहीं समझते थे।
उनके व्यक्तित्व का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि वे प्रशासनिक पद पर रहते हुए भी अपने नैतिक मूल्यों से समझौता करने को तैयार नहीं हुए। उनकी दृष्टि में पद की सार्थकता अधिकारों के उपभोग में नहीं, बल्कि उत्तरदायित्वों के ईमानदार निर्वहन में है। वे मानते हैं कि उन्होंने अपने सेवाकाल में अपना जमीर नहीं बेचा और इसी कारण भले ही वे आर्थिक अर्थों में अत्यधिक अमीर नहीं बन पाए, लेकिन आत्मसंतोष और नैतिक संपन्नता उनकी सबसे बड़ी पूंजी बनी रही।
वर्ष 2011 में कटिहार जिले से सेवानिवृत्त होने के पश्चात साहित्य ने उन्हें पुनः अपनी ओर आकर्षित किया। इसके बाद उन्होंने अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा साहित्य-सृजन, भाषा-संवर्धन और समाजसेवा को समर्पित कर दिया।
बज्जिका भाषा-साहित्य के संरक्षण और संवर्धन में महत्त्वपूर्ण योगदान-
उदय नारायण सिंह का साहित्यिक व्यक्तित्व हिंदी और बज्जिका, दोनों भाषाओं की सृजनात्मक परंपराओं से समृद्ध है। विशेष रूप से बज्जिका भाषा के इतिहास, स्वरूप, साहित्य और सांस्कृतिक पहचान को प्रतिष्ठित करने की दिशा में उनका योगदान उल्लेखनीय है।
सेवानिवृत्ति के बाद वर्ष 2011 से अब तक उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें काव्य-संग्रह अनुभवा, रागानुराग और धूप तले की छांव; आख्यानक काव्य सवितात्मजा; बज्जिका कहानी-संग्रह अमोला तथा बज्जिका भाषा-साहित्य के इतिहास पर केंद्रित पुस्तक बज्जिका भासा आ साहित्य के इतिहास प्रमुख हैं।
उनकी पुस्तक बज्जिका भासा आ साहित्य के इतिहास बज्जिका भाषा की ऐतिहासिक एवं साहित्यिक परंपरा को व्यवस्थित रूप में सामने लाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास है। इस कृति के माध्यम से उन्होंने बज्जिका के अध्ययन, अनुसंधान और तुलनात्मक भाषाई विमर्श के लिए उपयोगी आधार प्रस्तुत किया है।
उनकी साहित्यिक कृति सवितात्मजा को पढ़कर बज्जिका एवं हिंदी के विद्वान डॉ. शारदाचरण ने इसकी भाव-संपन्नता और संवेदनात्मक गहराई की सराहना की। वहीं, डॉ. रामप्रवेश सिंह, पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर ने अमोला तथा बज्जिका भासा आ साहित्य के इतिहास को बज्जिका की मूल प्रकृति और स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने वाली रचनाओं के रूप में रेखांकित किया।
डॉ. शारदाचरण ने भी इन दोनों पुस्तकों को बज्जिका साहित्य की अमूल्य धरोहर बताया। इसी क्रम में नेपाल के साहित्यकार प्रो. संजय साह मित्र ने बज्जिका भासा आ साहित्य के इतिहास को बज्जिका के इतिहास को समझने के लिए एक ठोस दस्तावेज के रूप में महत्त्वपूर्ण माना।
उनकी तीन अन्य पुस्तकें भी प्रकाशन की अंतिम प्रक्रिया में हैं-चिंतन के इंद्रधनुषी आयाम, उपनिषद के बज्जिका अनुशीलन और उदय सूक्ति सागर। इनमें स्वतंत्र आलेखों, सात उपनिषदों के बज्जिका भाषा में अनुशीलन तथा लगभग 1500 मौलिक सूक्तियों का संकलन शामिल है। इन कृतियों से उनकी वैचारिक व्यापकता, भारतीय दर्शन के प्रति रुचि और जीवनानुभवों को सूत्रात्मक अभिव्यक्ति देने की क्षमता का परिचय मिलता है।
पत्रकारिता और लोकभाषा के लिए सतत प्रयास-
उदय नारायण सिंह का योगदान पुस्तकों के लेखन तक सीमित नहीं है। बज्जिका को समाचार-पत्रों और व्यापक पाठक-समुदाय तक पहुंचाने के लिए भी उन्होंने अथक प्रयास किया है।
उनके दो वर्षों के निरंतर परिश्रम के परिणामस्वरूप प्रभात खबर के मुजफ्फरपुर संस्करण में बज्जिका कविता एवं लघुकथा के प्रकाशन के लिए बज्जिका कोना की शुरुआत 28 अगस्त 2026 को हुई। इस स्तंभ में प्रारंभिक रूप से उनकी दो कविताएं प्रकाशित हुईं। इसके बाद डॉ. विद्या चौधरी, पटना की दो लघुकथाएं तथा अनीता सिंह की दो बज्जिका कविताएं प्रकाशित हुईं।
उनकी रचनाएं राजभाषा पत्रिका, नया भाषा भारती, एक नई सुबह, निर्दलीय, दस्तक प्रभात, डिजिटल न्यूज ई-पेपर, स्वर्णिम दर्पण सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। वर्ष 2025 में प्रभात खबर के रांची संस्करण के दीपावली विशेषांक में उनकी चार बज्जिका कविताएं प्रकाशित हुईं। इस उपलब्धि पर समाचार-पत्र के बिहार-झारखंड प्रमुख आशुतोष चक्रवर्ती ने उन्हें प्रशस्ति-पत्र भी भेजा।
दूरदर्शन पर उनकी वार्ताएं और काव्यपाठ भी प्रसारित हुए हैं। विशेष रूप से 4 जनवरी 2025 को बज्जिका भाषा पर प्रसारित उनकी वार्ता ने उल्लेखनीय चर्चा प्राप्त की।
बज्जि-पेंटिंग को साहित्यिक पहचान दिलाने की पहल-
उदय नारायण सिंह की साहित्यिक दृष्टि केवल कविता, कहानी और भाषा के इतिहास तक सीमित नहीं है। उन्होंने लोककला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में भी काम किया है। बज्जि-पेंटिंग की कुशल कलाकार कंचन प्रकाश की कला को व्यापक पहचान दिलाने में उन्होंने साहित्यिक माध्यम से योगदान दिया। अपने आलेख *बज्जि-पेंटिंग इतिहास के आईने में के माध्यम से उन्होंने इस लोककला को ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों में परिभाषित करने और उसका प्रचार-प्रसार करने का प्रयास किया।
इसी योगदान के संदर्भ में उन्हें ग्रेटर कैलाश, नई दिल्ली स्थित चंपा आर्ट गैलरी में आयोजित कंचन प्रकाश की बज्जि-पेंटिंग प्रदर्शनी में विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। उनके अनुसार, इस अवसर पर उन्होंने बज्जि-पेंटिंग की प्रागैतिहासिक काल से वर्तमान तक की परंपरा और कलाकार कंचन प्रकाश के योगदान को रेखांकित किया।
साहित्यिक सम्मान और उपलब्धियां-
उदय नारायण सिंह की दीर्घकालीन साहित्यिक साधना और बज्जिका भाषा के विकास में योगदान के लिए उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना के गरिमामय सभागार में आयोजित समारोह में उन्हें केरल के तत्कालीन राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, राज्यसभा सांसद रवींद्र प्रसाद, पूर्व गृह सचिव एवं आईएएस अधिकारी लाल आर्य तथा सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ के हाथों प्रशस्ति-पत्र, शाल और स्मृति-चिह्न के साथ साहित्य मार्तण्ड की उपाधि से सम्मानित किया गया।
इसके अतिरिक्त उन्हें साहित्य सेवी शिखर सम्मान, अटल साहित्यकार गौरव सम्मान, प्रधानमंत्री साहित्य गौरव सम्मान, बज्जिका रत्न शिखर सम्मान, बज्जिका गौरव सम्मान तथा मातृभूमि-मातृभाषा गौरव सम्मान जैसे सम्मान प्राप्त होने का गौरव मिला है।
बिहार विधान सभा अध्यक्ष नंदकिशोर यादव, बिहार विधान परिषद के उपसभापति डॉ. रामवचन राय, बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार चंद्रवंशी तथा पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजकुमार के हाथों उन्हें विभिन्न अवसरों पर सम्मानित किया गया। बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति दिनेश चंद्र राय के हाथों भी बज्जिका भाषा के उन्नयन में योगदान के लिए उन्हें बज्जिका गौरव सम्मान प्राप्त हुआ।
इसके अतिरिक्त दरभंगा, समस्तीपुर, हाजीपुर, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, पटना और बेतिया सहित विभिन्न जिलों की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा उन्हें ढाई दर्जन से अधिक विशिष्ट सम्मान, प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिह्न और शाल प्रदान किए जा चुके हैं।
साहित्य के साथ सामाजिक और आध्यात्मिक सेवा-
उदय नारायण सिंह का व्यक्तित्व साहित्यिक सृजन के साथ-साथ सामाजिक सक्रियता से भी समृद्ध है। वे जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन, मुजफ्फरपुर में पिछले पांच वर्षों से प्रधानमंत्री पद पर कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त वे वरिष्ठ नागरिकों की सेवा से जुड़े संगठनों में उपाध्यक्ष के रूप में दायित्व निभा रहे हैं।
सनातन धर्म जागरण मंच, मुजफ्फरपुर के अध्यक्ष के रूप में वे भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और धार्मिक परंपराओं के प्रचार-प्रसार में सक्रिय हैं। उनके प्रयासों से बीएमपी-06 दुर्गास्थान मंदिर में तीन बार वृंदावन के संतों द्वारा भागवत एवं रामकथा का आयोजन कराया गया।
वे बज्जिका विकास मंच, मुजफ्फरपुर के उपाध्यक्ष तथा बज्जिकांचल विकास पार्टी के उपाध्यक्ष के रूप में भी बज्जिका भाषा और बज्जिकांचल की सांस्कृतिक पहचान के संवर्धन से जुड़े हैं। दिनकर साहित्य परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में भी वे साहित्यिक गतिविधियों को गति प्रदान कर रहे हैं।
निजी जीवन की वेदना और साहित्य में आत्मिक संबल-
उदय नारायण सिंह का जीवन जितना साहित्यिक उपलब्धियों और सामाजिक सक्रियता से समृद्ध है, उतना ही गहन व्यक्तिगत अनुभवों से भी जुड़ा है। 13 दिसंबर 2025 की रात्रि में उनकी धर्मपत्नी इंदु सिन्हा का निधन हो गया। जीवन के इस गहरे वियोग ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया, किंतु उन्होंने साहित्य-साधना और आत्मचिंतन में अपने लिए नया संबल खोजा।
वे साहित्य को अपनी मां, जीवन-संगिनी और आत्मिक सहचर के रूप में देखते हैं। उनके लिए लेखन केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं को समझने, जीवन के सत्य का अन्वेषण करने और आंतरिक शांति प्राप्त करने की साधना है।
उनके विचारों में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, आत्मविश्लेषण और निरंतर सक्रिय रहने की प्रेरणा प्रमुख है। वे मानते हैं कि व्यक्ति दूसरों को समझाने में जितना समय व्यतीत करता है, उसका आधा समय भी यदि स्वयं को समझने में लगाए, तो अनेक समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है।
उनकी यह पंक्तियां उनके जीवन-दर्शन का सार प्रस्तुत करती हैं-
“माप लेंगे जब हम अपने से अपनी दूरी,
मिल जाएगी तब हमें जीवन की कस्तूरी।”
यह आत्मान्वेषण, अनुभव और विवेक का संदेश है, जो उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को और अधिक गहराई प्रदान करता है।
मैं पिता-तुल्य आदरणीय उदय नारायण सिंह जी का हृदय से आभारी हूं, जिन्होंने मुझे अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने तथा उस पर लिखने का अवसर प्रदान किया। लेखन से पूर्व उनसे दूरभाष पर बातचीत करने का अवसर मिला। बातचीत के दौरान उनकी सहजता, आत्मीयता और विनम्रता ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया।
साहित्य के क्षेत्र में दशकों की साधना, विपुल लेखन, अनेक सम्मान और भाषा-संवर्धन के महत्त्वपूर्ण कार्यों के बावजूद उनके व्यवहार में कहीं भी अहंकार अथवा पद-प्रतिष्ठा का प्रदर्शन अनुभव नहीं हुआ। एक ओर वे साहित्य के विशाल वटवृक्ष के समान हैं, तो दूसरी ओर संवाद में उनकी सहजता किसी आत्मीय अभिभावक का बोध कराती है। यही गुण उनके व्यक्तित्व को और भी अनुकरणीय बनाता है।
एक साधारण युवा रचनाकार के रूप में मेरे लिए यह गौरव का विषय है कि मुझे अपने समय के ऐसे वरिष्ठ साहित्यकार की जीवनयात्रा को शब्द देने का अवसर प्राप्त हुआ। उनकी साधना मुझे यह प्रेरणा देती है कि साहित्य में वास्तविक ऊंचाई केवल प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि विनम्रता, निरंतर अध्ययन, मौलिक चिंतन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व से प्राप्त होती है।








