राजेंद्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल
(उपन्यास भाग-2)
15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ, तो देश ने न केवल विदेशी हुकूमत से मुक्ति पाई, बल्कि एक ऐसे लोकतांत्रिक और समतावादी समाज की नींव रखी जहाँ हर नागरिक को समानता का अधिकार था। भारतीय संविधान ने ‘कानून के समक्ष समानता’ और ‘अस्पृश्यता के अंत’ की घोषणा की। हालांकि, सदियों से चली आ रही सामंती सोच (Feudal Mindset) और भूमिहीन निर्धन वर्ग का शोषण रातों-रात समाप्त नहीं हुआ। कानूनी तौर पर जमींदारी प्रथा खत्म होने के बावजूद, सामाजिक और आर्थिक धरातल पर सामंतवाद ने अपना रूप बदलकर शोषण का सिलसिला जारी रखा था।
आजादी से पहले सामंत (जमींदार, ताल्लुकदार और राजा-महाराजा) सीधे तौर पर सत्ता और जमीन के मालिक थे। आज़ादी के बाद जब ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम और भूमि सुधार, कानून लागू किए गए, तो सामंतों की कानूनी शक्तियाँ छिन गईं। कई रसूखदार सामंतों ने कानूनी कमियों का फायदा उठाकर बेनामी संपत्ति के रूप में सैकड़ों-हजारों एकड़ जमीन अपने पास ही रखी साथ ही लोकतांत्रिक व्यवस्था आते ही पुराने सामंतों और बड़े भूस्वामियों ने राजनीतिक दलों में प्रवेश कर लिया। वे सांसद, विधायक और मंत्री बन गए इस प्रकार, जो सत्ता पहले राजमहलों से चलती थी, वह अब सामंतों के माध्यम से मनमाने तरीके से चलने लगी।
सामंती सोच का सबसे गहरा जुड़ाव जाति व्यवस्था से था। उच्च जातियों के भूस्वामी खुद को प्राकृतिक रूप से शासक और निर्धन, दलित व पिछड़े वर्ग को अपना सेवक मानते रहे। निर्धन वर्ग का बहुआयामी शोषण जिसमें मुख्य रूप से भूमिहीन कृषि मज़दूर, दलित और आदिवासी शामिल थे, आज़ादी के बाद भी लंबे समय तक बुनियादी अधिकारों के लिए तरसता रहा। उनका शोषण कई रूपों में हुआ। आर्थिक शोषण और बंधुआ, भूमि सुधारों के पूरी तरह सफल न होने के कारण निर्धन वर्ग ज़मीन से महरूम रहा। उन्हें पेट भरने के लिए मज़दूरी के लिए वापस उन्हीं पुराने सामंतों के खेतों पर जाना पड़ा। कम मज़दूरी देना, बिना पैसे के काम कराना (बेगारी) और पीढ़ियों तक चलने वाला ‘कर्ज का जाल’ इस वर्ग की नियति बन गया।
सामंती अत्याचार के शिकार लाखों परिवार हुए उन्हीं परिवार में हीरा का परिवार था। विवाह के ही दिन पिता कि मृत्य, शराबी सौतेले भाई की हरकतों से हीरा अपनी माँ के मायके सिमरिया गाँव में गर्भवती स्थिति में चली गई। उधर पार्वती और उनके भाई जो ग्राम प्रधान थे, ने परित्यक्त हीरा का दूसरा सामाजिक गठबंधन इस शर्त पर पास के गाँव के नवयुवक गणेश से कर दिया कि वह सिमरिया गाँव में ही रहकर हीरा और उसकी चार छोटी बहिनों का लालन पालन के साथ शादी विवाह भी करेगा। गणेश और उसके बड़े भाई ने सभी शर्तें स्वीकार कर ली।
दूसरे पति के साथ भी हीरा का जीवन सामाजिक प्रताड़ना और अपमान से भरा हुआ था। स्थानीय सामंत नहीं चाहते थे कि कोई सुन्दर महिला सज -सँवर के घर से बाहर निकले, सानुचित सोच वाले लोग आज भी यह बर्दाश्त नहीं कर पाते थे कि कोई निर्धन या शोषित वर्ग का व्यक्ति उनके बराबर बैठे, अच्छे कपड़े पहने या घोड़ी पर चढ़े। गाँवों में दलितों और कमजोर वर्गों पर होने वाले अत्याचार इसी सामंती अहंकार का परिणाम था ग्रामीण गरीब लोग गाँव छोड़कर मजबूरन शहर पलायन करने लगे। अनेक बार निर्धन वर्ग की हीरा और उसके पति को सबसे अधिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। उनका खेत मज़दूर के रूप में आर्थिक शोषण का शिकार तो थीं ही, साथ ही सामंतों द्वारा उनके साथ लैंगिक हिंसा और मानसिक उत्पीड़न करना भी आम बात थी।
गणेश के आने बाद हीरा ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम पूरे परिवार ने कला रखा। कला के जन्म के तीन साल बाद मुन्ना का जन्म भी सिमरिया में हुआ। मुन्ना जन्म के दो साल बाद देवी – देविका जुड़वां भाई बहिन हुए तो हीरा का परिवार राजी खुशी से रहने लगा। लेकिन सामंती षड्यन्त्र और प्रताड़ना पूरे गाँव में बड़ रही थी। सामंती निठठल्ले लड़के दिन रात शराब पीकर हुड़दंग मचाते। गाँव का कोटवार भी सामंती कि सोच और रहमोकरम पर जीत था। एक दिन स्थानीय लड़के ने हीरा को सरे – आम जबरिया छेड़ने का प्रयास किया तो हीरा की माँ और भाई ने बदमाश लड़के के पिता से शिकायत की तो लालबाबू सिंह उलटे गाली -गलौज करके दुखी परिवार के ऊपर बंदूक तान लिए कि आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरी कोठी पर आने की ? भागो इधर से वरना सबको छली छली कर दूंगा। अपनी जान बचाकर पार्वती और भाई रोते – रोते घर आए और हीरा से बोले – बेटा ,,अब यह गाँव रहने लायक नहीं, जितनी जल्दी हो सके आप वापस शहर चले जाओ, सभी बच्चों को लेकर वरना अनर्थ हो जाएगा।
हीरा ने अपने पति गणेश से सलाह ली तो वो भी दुखी मन से बोले कि मैं कुछ दिन यहाँ रुकता हूँ आप बच्चों को लेकर भोर होने से पहले निकल जाओ। माँ -बेटी रात भर डरे सहमें अपने छोटे – छोटे बच्चों रोते – बिलखते सुला रहें थे। कला अब समझने लगी थी सब क्यों परेशान हैं? दूसरी तरह चार साल का मुन्ना सबको देख- सुनकर सदमे में था।
(शेष भाग आगे)







