दार्शनिक सूर्य जी
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
‘मूर्तियों से परे’
(सच्ची नव-रात्रि)
नौ दिवस!
खुद में
बुराई देखते हो,
मनुष्यों रे!
तुम,
पूरा साल दूसरों में बुराई देखते हैं,
नौ दिन खुद में भी देखना,
और
नवरात्रि
खत्म होने के बाद
भी देखते रहना।
यही तो नवरात्र है।
शक्ति मूर्ति में नहीं,
तुम में ही होती है।
भय-मुक्त होकर जीना।
काव्य-बोध (सीख): यह कविता भारतीय दार्शनिक और कविवर ‘सूर्य जी’ की कालजयी रचना है। यह संदेश सभी को किसी बाह्य धार्मिक कर्मकांड अथवा रूढ़िवादिता में उलझने के बजाय, एक जागरूक, विचारशील और संवेदनशील मनुष्य बनने की प्रेरणा देता है। यह रचना यह बोध कराती है कि वास्तविक नवरात्रि केवल नौ दिनों का अनुष्ठान मात्र नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को निरंतर सुधारने की एक सतत जीवन-शैली है। असली ईश्वरीय शक्ति हमारी अपनी आत्मा और दृढ़ संकल्प में निहित है, जिसे पहचान कर हमें समाज में भय-मुक्त होकर जीना चाहिए।







