विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ (पूर्व मुख्य अभियंता) (लंदन प्रवास पर)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
पुस्तक चर्चा
अपने होने की पहचान की तलाश है अस्मि
किसी पुस्तक पर चर्चा करना केवल उसकी कथा सुनाना नहीं होता, उसके भीतर छिपे विचारों, संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि को समझने का प्रयास है। मेरे लिए ‘अस्मि’ ऐसी ही एक कृति है, जो एक स्त्री की कहानी कहते हुए हम सबके सामने एक बुनियादी प्रश्न रखती है – दूसरों के लिए जीते हुए क्या स्त्रियाँ अपने लिए जीना भूल जाती हैं?
‘अस्मि’ का अर्थ होता है – ‘मैं हूँ’। यह छोटा-सा शब्द अपने भीतर एक बड़ा जीवन-दर्शन समेटे है। हम अपने जीवन में अनेक भूमिकाएँ निभाते हैं। किसी के माता-पिता, जीवनसाथी, बेटे-बेटी और मित्र होते हैं। इन रिश्तों के साथ जिम्मेदारियाँ जुड़ी होती हैं। लेकिन इन सबसे अलग हमारा अपना व्यक्तित्व भी है। हमारी इच्छाएँ, रुचियाँ और सपने भी हैं। क्या हम उन्हें पहचान पाते हैं? शिखा वार्ष्णेय का उपन्यास इन्हीं सवालों को कथा का आधार बनाता है।
शिखा वार्ष्णेय पत्रकारिता और साहित्य, दोनों से जुड़ी रही हैं। उन्होंने मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई की। लंदन में रहते हुए भी उनका लेखन भारतीय पाठकों से निरंतर संवाद करता है।
उपन्यास की केंद्रीय पात्र एला एक शिक्षित महिला है। उसका परिवार है, पति राजीव है और बेटा अंकुर है। बाहर से उसका जीवन सामान्य और व्यवस्थित दिखाई देता है, लेकिन भीतर वह अकेली है। परिवार की अपेक्षाएँ पूरी करते-करते उसकी अपनी रुचियाँ पीछे छूट गई हैं।
एला मानसिक तनाव और अवसाद से गुजरती है। इसी बीच एक पैराग्लाइडिंग दुर्घटना उसके जीवन की दिशा बदल देती है। वह एक दूरस्थ पहाड़ी गाँव में पहुँच जाती है। वहाँ के लोग उसके परिचित नहीं हैं, फिर भी वे उसकी देखभाल करते हैं। गाँव में एला धीरे-धीरे अपने भीतर लौटने लगती है। वह चित्र बनाती है, घरों और दीवारों को रंगों से सजाती है, बच्चों के साथ समय बिताती है, अपने वनस्पति-विज्ञान के ज्ञान से लोगों की मदद करती है। उसकी प्रतिभा समुदाय के जीवन का हिस्सा बन जाती है।
गाँव का अरलू उसे जापानी अवधारणा ‘इकिगाई’ से परिचित कराता है, अर्थात वह उद्देश्य जो हमें हर सुबह उठने का कारण देता है। एला के लिए चित्रकला और गाँव के लोगों की सहायता ऐसे ही उद्देश्य बन जाते हैं।
कथा का वास्तविक संघर्ष तब सामने आता है, जब एला का बेटा अंकुर उसे खोजते हुए गाँव पहुँचता है और चाहता है कि माँ लौट चले। अंकुर कुछ समय गाँव में बिताता है और समझता है कि उसकी माँ यहाँ सचमुच खुश है। अंततः वह उसके निर्णय का सम्मान करता है।
मेरी दृष्टि में यह उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है – प्रेम और अधिकार के बीच का अंतर। एला का निर्णय हमें रिश्तों की नई व्याख्या की ओर ले जाता है। किसी स्त्री का माँ या पत्नी होना उसकी पहचान का एक हिस्सा है, संपूर्ण पहचान नहीं।
शिवना प्रकाशन ने हिंदी की विभिन्न विधाओं के साथ प्रवासी लेखकों की रचनाओं को भी मंच दिया है, जो हिंदी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ‘अस्मि’ का सार शायद इसी एक वाक्य में है कि मैं दूसरों के लिए हूँ, लेकिन मेरा अपना होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
(विनायक फीचर्स)







