संतोषी जीवन

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 चन्द्रमती चतुर्वेदी ‘चन्दू’                                               बस्ती, अयोध्या धाम

         

                  (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                              (w) 6395080071

 

 

 

संतोषी जीवन

 

धन-दौलत से बड़ा जगत में,

मन का सुख अनमोल है,

संतोषी जीवन जीने का,

अपना अलग ही मोल है।

 

महलों में भी नींद न आए,

चिंता घेरे रात में,

कुटिया में भी चैन मिले जब,

प्रेम बसे हर बात में।

 

चाह भले आकाश छुए पर,

पैर धरा पर रखना है,

मेहनत करके आगे बढ़ना,

मन निर्मल ही रखना है।

 

दूसरों की थाली देखकर,

मन में आग न पालो तुम,

अपने हिस्से की खुशियों को,

हँसकर आज सँभालो तुम।

 

लालच की गठरी भारी है,

सुख को दूर भगाती है,

तृष्णा जितनी बढ़ती जाती,

नींद उड़ाती जाती है।

 

थोड़े में मुस्कान सजा लो,

यही बड़ी धनवानि है,

प्रेम बाँटकर देखो जग में,

कितनी सुखद कहानी है।

 

जो मिल जाए उसका आदर,

जो न मिले स्वीकार करो,

कर्म तुम्हारा धर्म बने और,

प्रभु का नित आभार करो।

 

सुख आए तो फूल न जाना,

दुख आए तो टूटो मत,

समय सदा परिवर्तनशील है,

धीरज अपना खोना मत।

 

रिश्तों में विश्वास बचाना,

मीठे बोल सुनाना है,

अपनेपन की छाँव तले ही,

जीवन सफल बनाना है।

 

चन्द्रमती संदेश दे रही,

सुन लो जग के प्राणी,

संतोषी मन सबसे धनी है,

यही सत्य की वाणी।

 

धन से सुख के साधन मिलते,

मन से सुख का द्वार,

संतोष जहाँ पर वास करे,

खुशियों का संसार।

***************

 

दीदार होता तो मिलती है राहत,

खुद से भी ज्यादा तुम्हारी है चाहत।

 

तुम दूर हो फिर भी दिल में बसे हो,

मेरी धड़कन में बनकर धड़कते रहे हो।

कैसे बताऊँ तुम्हें दिल की हालत,

दीदार होता तो मिलती है राहत।

 

रातें गुजरती हैं तारों को गिनकर,

आँसू भी गिरते हैं तकिए पे बिखरकर।

तुम बिन अधूरी है जीवन की रंगत,

खुद से भी ज्यादा तुम्हारी है चाहत।

 

एक बार आकर मुझे तुम निहारो,

खामोश नजरों की भाषा विचारो।

आँखों में पढ़ लेना दिल की इबारत,

दीदार होता तो मिलती है राहत।

 

तुमसे ही आरंभ, तुम पर ही अंत है,

तुमसे ही जीवन का हर एक वसंत है।

तुम ही मेरी पूजा, तुम ही इबादत,

खुद से भी ज्यादा तुम्हारी है चाहत।

 

चन्द्रमती दिल की यही आरजू है,

मिल जाएँ तुम तो यही जुस्तजू है।

पूरी हो जाए मिलन की ये मन्नत,

दीदार होता तो मिलती है राहत।

           *********************

 

दूर जा न सकूँगी, बताती हूँ तुमको,

दिल की हर धड़कन पुकारेगी तुमको।

 

तुम्हें देखकर ही खिल उठती हूँ मैं,

तुम्हारी खुशी में सँवरती हूँ मैं।

तुम्हारे बिना मन लगे ना कहीं भी,

तुम्हारे सिवा अब जँचे ना कोई भी।

 

मेरी अनकही बात समझना कभी तुम,

मेरी आँख पढ़कर भी पढ़ना कभी तुम।

लबों पर न आए जो दिल की कहानी,

निगाहों से पढ़ लेना मेरी ज़िंदगानी।

 

न रूठो कि मन को मनाना पड़े फिर,

न तरसाओ कि आँसू बहाना पड़े फिर।

तुम्हें चाहना मेरी आदत नहीं है,

ये पल भर की कोई मोहब्बत नहीं है।

 

तुम्हारे लिए मन में सम्मान भी है,

तुम्हीं से जुड़ा मेरा अरमान भी है।

बस इतना समझना, मेरे हमसफर तुम,

मेरी हर खुशी का हो सुंदर सफर तुम।

           ************************

 

अगर जानते ऐसी पीड़ा बढ़ेगी

 

अगर जानते ऐसा पीड़ा बढ़ेगा,

चमन ये जलेगा, मकाँ भी ढहेगा।

कदम प्रेम-नगरी में मेरा न बढ़ता,

न सपने सजाते, न आहें ही भरते।

 

अगर जानते दिल पे बिजली गिरेगी,

खुशी की हर इक डाल पल में झरेगी।

न नैनों में सपनों के दीपक जलाते,

न चुपके से तुमको हृदय में बसाते।

 

तुम्हारी ही चाहत में खुद को भुलाया,

तुम्हें अपना माना, तुम्हें ही बनाया।

मगर क्या पता था कि अंजाम होगा,

मेरे ही हिस्से में बस ग़म तमाम होगा।

 

अगर जानते इतनी पीड़ा मिलेगी,

खिली जिंदगी भी अधूरी रहेगी।

न हम प्रेम की राह में पाँव धरते,

न जीते हुए इस तरह आहें भरते।

 

तुम्हारी हँसी पर बहारें लुटाईं,

तुम्हारी खुशी में खुशियाँ मनाईं।

तुम्हारे लिए हमने खुद को मिटाया,

तुम्हें अपनी धड़कन का हिस्सा बनाया।

 

तुम्हारी वफ़ा पर भरोसा किया था,

तुम्हें अपनी दुनिया समझ ही लिया था।

मगर क्या पता था बदल जाओगे तुम,

हमें बीच राहों में छोड़ जाओगे तुम।

 

वो वादे तुम्हारे कहाँ खो गए हैं,

वो मीठे से सपने कहाँ सो गए हैं।

जिन्हें सुनके हम रात भर मुस्कुराते,

वही आज आँखों में आँसू हैं लाते।

 

कभी चाँदनी रातें सुहानी लगी थीं,

तुम्हारी वो बातें कहानी लगी थीं।

वही चाँद अब मुझको उदास करता,

तुम्हारी कमी का अहसास करता।

 

तुम्हारी यादों का ये कैसा असर है,

कि आँखों में आँसू, जुबाँ पर ज़हर है।

न दिल की कहें तो घुटन बढ़ने लगती,

कहें दर्द अपना तो आँखें हैं भरतीं।

 

किसे अब सुनाएँ कहानी हमारी,

कहाँ खो गई है खुशी की किलकारी।

जिसे राज़ दिल का सुनाते रहे हम,

उसी से अपना दर्द छिपाते रहे हम।

 

कभी सोचते हैं कि भूलें तुम्हें हम,

नई राह जीवन की चुन लें अब हम।

मगर याद बनकर चले आते हो तुम,

मेरे मौन मन को रुलाते हो तुम।

 

न शिकवा तुम्हीं से, न किस्मत से गिला है,

मुझे प्रेम करके ये कैसा मिला है।

जिसे फूल समझा, वही शूल निकला,

मेरा ही सपना मेरा प्रतिकूल निकला।

 

************************

मेरी आखिरी चिट्ठी

 

सुनो प्रिय! तुम्हें आज पैगाम लिखती हूँ,

दबी हुई भावनाओं के नाम लिखती हूँ।

जो बातें कभी तुमसे कह ही न पाई,

उन्हीं बातों को आज सरेआम लिखती हूँ।

 

तुम्हें याद होगा वो सावन सुहाना,

तुम्हारा वो हँसना, मेरा मुस्कुराना।

वो चुपके से नजरों का मिलना हमारा,

वो सपनों में अपना जहाँ बसाना।

 

उसी मोड़ पर आज तन्हा खड़ी हूँ,

जहाँ छोड़कर तुम गए थे मुझे प्रिय।

न जाने कहाँ खो गईं वो बहारें,

मैं यादों के दीपक जलाए खड़ी हूँ।

 

तुम्हें दोष देकर भला क्या मिलेगा,

मेरे अश्रुओं से तुम्हें क्या मिलेगा?

मोहब्बत तो दिल से निभाई थी मैंने,

निभाने का फल भी मुझे क्या मिलेगा?

 

मगर एक दिन तुमको एहसास होगा,

मेरे प्रेम का भी कुछ आभास होगा।

किसी भीड़ में जब अकेले रहोगे,

तुम्हें मेरे होने का आभास होगा।

 

न आना कभी तुम दया लेकर प्रिय,

न देना मुझे झूठी सांत्वना प्रिय।

अगर लौटना तो वही प्रेम लेकर,

जो बन जाए जीवन की साधना प्रिय।

 

मैं अब भी तुम्हारी खुशी चाहती हूँ,

तुम्हारी सलामती की दुआ करती हूँ।

मिले तुमको दुनिया की सारी बहारें,

मैं अपने लिए बस सुकून माँगती हूँ।

 

ये मेरी आखिरी चिट्ठी समझना,

मेरे मौन की भाषा को भी पढ़ना।

मैं तुमको भुलाऊँ, जरूरी नहीं है,

मगर अब मुझे खुद के लिए भी सँवरना।

 

तुम्हारी कहानी में किरदार थी मैं,

तुम्हारे लिए एक उपहार थी मैं।

भले आज तुमको मेरी कद्र न हो,

कभी तुम्हारे दिल का संसार थी मैं।

***********************

 

अड़े हम पड़े हैं तुम्हारी डगर में

हो जाए कुछ भी भले इस सफर में।

 

तुम्हारी ही चाहत हृदय में सजाकर,

खड़े हैं तुम्हारी ही राहें निहारकर।

नहीं अब किनारा किसी दूसरे का,

तुम्हीं को बसाया है दिल के नगर में।

 

अड़े हम पड़े हैं तुम्हारी डगर में,

हो जाए कुछ भी भले इस सफर में।

 

हवाएँ विरोधी चलें तो चलेंगी,

ये राहें भले ही कठिन होंगी।

इरादे हमारे नहीं डगमगाएँ,

लगी प्रेम की लौ हमारे जिगर में।

 

अड़े हम पड़े हैं तुम्हारी डगर में,

हो जाए कुछ भी भले इस सफर में।

 

न शिकवा करेंगे, न तुमसे गिला है,

तुम्हारी ही यादों का दीपक जला है।

मिलन हो कि दूरी, हमें क्या पता है,

तुम्हारा ही चेहरा है आँखों के घर में।

 

अड़े हम पड़े हैं तुम्हारी डगर में,

हो जाए कुछ भी भले इस सफर में।

 

कभी तो हमारी पुकारें सुनोगे,

कभी प्रेम की धड़कनें तुम चुनोगे।

हमारी वफ़ा पर भरोसा तो करना,

नहीं प्रेम बिकता किसी भी असर में।

 

अड़े हम पड़े हैं तुम्हारी डगर में,

हो जाए कुछ भी भले इस सफर में।

 

चन्द्रमती की चाहत का इतना फसाना,

तुम्हें मानकर ही तुम्हें दिल में बसाना।

नहीं हार मानेंगे सच्चे प्रेम से हम,

तुम्हारा ही सपना रहे उम्र भर में।

 

अड़े हम पड़े हैं तुम्हारी डगर में,

हो जाए कुछ भी भले इस सफर में।

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