युगपुरुष ‘सूर्य जी’
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
लेख:
जीवन: एक सहज प्रवाह
धैर्य, संतोष और आत्म-रक्षा की राह
हे मनुष्यों! यदि तुम अपने मन को हमेशा मजबूत बनाए रखते हो, तो सब कुछ तुम्हारे पास होता है और सब ठीक रहता है। धैर्य और संतोष को कभी न छोड़ना, क्योंकि धैर्य बनाए रखना ही जीवन का आधार है। जीवन को हमेशा सुंदर बनाए रखा जा सकता है, बस आपको यह करना होगा कि हर चीज़ को जीतने की होड़ में मत लगिए।
जीवन वह है जो हम आज जी रहे हैं; कल जो था, वह बस एक सपना था जो हमने देखा था। हमें हर पल को सहेज कर जीना है और व्यर्थ की बहस से बचना है। इस भीषण और निष्ठुर दुनिया में इंसान का अच्छा होना अच्छी बात है, पर ज़रूरत से ज़्यादा अच्छा होना दुखी कर देता है। इसलिए अच्छे और सज्जन बने रहो, पर साथ ही अपने स्वाभिमान और अस्तित्व को बचाने का प्रयास भी करते जाओ।
जितना हो सके भीड़ से बचो। भीड़ के पास विवेक, संवेदना और गहरा संवाद नहीं होता; वहाँ होता है तो बस कुचल देने वाला एक अंधा हथियार। अपने कदम बढ़ाते जाओ, हर दिन बेहतर होते जाओ और निरंतर चलते जाओ… यही अंतस का उजास है।
(यह लेख दार्शनिक गहराई, व्यावहारिक बुद्धिमत्ता व मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत है। महनीय साहित्यकार, आध्यात्मिक विचारक, दार्शनिक, मानवतावादी तथा संस्कृति एवं समरसता के संरक्षक, युगपुरुष ‘सूर्य जी’ द्वारा रचित है, जो आदर्श व्यक्तित्व के धनी हैं।)







